
उदित वाणी, जमशेदपुर: श्रीनाथ कॉलेज ऑफ एजुकेशन में रविंद्र नाथ टैगोर जयंती का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ रविंद्र नाथ टैगोर की तस्वीर पर कुलपति तथा शिक्षकों द्वारा पुष्प अर्पित कर किया गया.
इस अवसर पर बीएड की छात्रा अंजू महतो ने रविन्द्र संगीत पर एक मोहक नृत्य प्रस्तुत किया. इसके अतिरिक्त छात्र-छात्राओं द्वारा कई रंगारंग कार्यक्रमों की प्रस्तुति हुई. छात्रा कुसुम ने रविन्द्र नाथ टैगोर की जीवनी पर प्रकाश डाला. कुलपति डॉ. गोविंद महतो, सहायक प्राध्यापक रवि कांत ने टैगोर की जीवनी पर प्रकाश कार्यक्रम का संचालन छात्र देवव्रत और श्रावणी ने किया.
श्रीनाथ पब्लिक स्कूल में रविन्द्रनाथ जयंती मनायी गई
श्रीनाथ पब्लिक स्कूल में भारत के महान विभूति एवं प्रख्यात साहित्य सम्राट रविंद्र नाथ टैगोर की जयंती बड़े धूमधाम से मनाया गया. इस अवसर पर विद्यालय के सभागार में रविंद्र नाथ के चित्र पर विद्यालय के अध्यक्ष महोदय सुखदेव महतो अकादमिक निदेशक दिलीप कुमार महतो, प्रधानाचार्य संजय कुमार सिंह और समस्त शिक्षक शिक्षिकाओं ने माल्यार्पण कर पुष्प अर्पित किए.
छात्रों ने रविंद्र नाथ टैगोर द्वारा लिखी गई कविता एवं नाटकों का मंचन बखूबी किया,साथ ही उनके जीवन परप्रकाश डाले. श्रोतागण छात्रों की प्रतिभा को देखकर हर्षित हुए.
अध्यक्ष महोदय ने समस्त छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहा कि रविंद्र नाथ ठाकुर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. इन्होंने साहित्य के कई क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई. वे केवल संगीतकार,नाटक कार,निबंधकार ही नहीं बल्कि साहित्य की कई विधाओं में निपुण थे.
इन्होंने हमारे राष्ट्र को राष्ट्रगान की सौगात दी साथ ही बांग्लादेश का राष्ट्रगान आमार सोनार बांग्ला भी इन्हीं की कृति है आज हम सहृदय इस महान विभूति को याद करउन्हें नमन करते हैं.
वही प्रधानाचार्य ने रविंद्र नाथ टैगोर की जीवनी को संक्षेप में कहा कि यूं तो 7 मई 1861 ईस्वी में रविंद्र नाथ जी का जन्म हुआ था, पर बंगाली परिवार में जन्म लेने के कारण उनका जन्म दिवस 25 बैसाख को मनाया जाता है जो इस बार 9 मई को आया है. रविंद्र नाथ टैगोर भारत के दूसरे व्यक्ति थे जिन्होंने विश्व धर्म संसद को दो बार संबोधित किया.
उनकी लोकप्रिय काव्य रचना गीतांजलि के लिए सन 1913 ईस्वी में उन्हें साहित्य के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें सर की उपाधि दी, परंतु जलियांवाला बाग कांड 1919 के बाद उन्होंने इस उपाधि को वापस कर दिया गया था. हम आज इस महान विभूति को याद कर स्वयं को गौरवा न्वित महसूस कर रहे हैं.


