उदित वाणी, जमशेदपुर : दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में प्रस्तावित जनजातीय सांस्कृतिक समागम (Tribal Cultural Congregation) का जमशेदपुर में प्रबुद्ध समाज और संगठनों द्वारा विरोध शुरू हो गया है. शनिवार की शाम जमशेदपुर के व्यस्त इलाके साकची स्थित बिरसा चौक (Birsa Chowk Sakchi) पर विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से एकत्रित होकर एक सांकेतिक विरोध प्रदर्शन किया.
कोल्हान क्षेत्र के सामाजिक संगठन और बुद्धिजीवी हुए शामिल
इस विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम में कोल्हान क्षेत्र (Kolhan Region) के कई प्रमुख सामाजिक संगठनों, छात्र-युवाओं, बुद्धिजीवियों, कलाकारों और आम नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया. प्रदर्शन के दौरान आदिवासी समाज के अधिकारों, उनकी विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़े गंभीर मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया.
सरना धर्म कोड और पेसा कानून को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना
प्रदर्शन में शामिल वक्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की वास्तविक समस्याओं और बुनियादी मांगों को नजरअंदाज किया जा रहा है. केवल सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से उनकी पहचान को सीमित करने का प्रयास हो रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि आदिवासी समुदाय वर्षों से सरना धर्म कोड (Sarna Dharma Code), जल-जंगल-जमीन की सुरक्षा, पेसा कानून (PESA Act), वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, विस्थापन की समस्या, स्थानीय भाषाओं के संरक्षण तथा शिक्षा और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दों पर लगातार संघर्ष कर रहा है, लेकिन इन जरूरी सवालों पर सरकार द्वारा अपेक्षित पहल नहीं की जा रही है.
केवल पारंपरिक नृत्य तक सीमित नहीं है आदिवासी संस्कृति
विरोध सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी संस्कृति केवल पारंपरिक नृत्य, गीत-संगीत और वेशभूषा तक सीमित नहीं है. यह पूरी तरह से प्रकृति आधारित जीवन-दर्शन, सामुदायिक व्यवस्था, पारंपरिक स्वशासन प्रणाली और विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ी हुई है. ऐसे में केवल सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से आदिवासी पहचान को प्रस्तुत करना उनकी व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मांगों की अनदेखी करना है.
आदिवासियों के संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने की मांग
प्रदर्शनकारियों ने केंद्र सरकार (Central Government) से पुरजोर मांग की कि यदि आदिवासी समाज के सम्मान और संरक्षण को लेकर वाकई गंभीरता दिखाई जानी है, तो सरना धर्म कोड को जल्द मान्यता दी जाए. इसके साथ ही पेसा और वनाधिकार कानून को प्रभावी रूप से लागू करने, विस्थापन की समस्याओं के स्थाई समाधान तथा स्थानीय भाषाओं और संस्कृति के संरक्षण के लिए धरातल पर ठोस कदम उठाए जाएं.
यह पूरा कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से संपन्न हुआ. अंत में आयोजकों ने स्पष्ट किया कि आदिवासी अधिकारों और संवैधानिक पहचान से जुड़े इन मुद्दों पर आने वाले दिनों में जनजागरण अभियान और व्यापक आंदोलन चलाया जाएगा. इस महत्वपूर्ण प्रदर्शन में मुख्य रूप से दीपक रंजीत, सुनील हेब्रम, दिनकर कच्छप, उपेंद्र बांद्रा आदि प्रमुखता से शामिल थे.


