
उदित वाणी, जमशेदपुर: बुधवार को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन संताली, हो, कुड़माली साहित्य एवं संस्कृति का अन्य साहित्य एवं संस्कृति के साथ तुलनात्मक अध्ययन विषय पर चर्चा-परिचर्चा किया गया.
जिसमें कई सारे विद्वान प्राध्यापक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित हुए और अधिकतर विद्वानों ने अपने-अपने आलेख प्रस्तुत किए. इन आलेखों में साहित्य एवं संस्कृति पर विशेष रूप से बंगला, ओड़िया, हिंदी, संस्कृत तथा मुंडारी साहित्य तथा संस्कृति के साथ तुलनात्मक विश्लेषण किया गया. जिससे जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के छात्रों को विशेष लाभ प्राप्त हुआ है.
दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन सत्र विश्वविद्यालय ऑडिटोरियम में किया गया. समापन सत्र में अतिथि के रूप में कोलकाता स्थित सीताराम वैदिक आदर्श संस्कृत विश्वविद्यालय से आए हुए डॉ. शशिभूषण मिश्रा तथा ओडिशा के जगन्नाथ संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रो बसंत मिश्रा उपस्थित थे.
कुलगीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई. स्वागत भाषण टीआरएल प्रभारी विभागाध्यक्ष डॉ अर्चना सिंन्हा ने दिया. मानविकी संकाय अध्यक्ष डॉ सत्यप्रिय महालिक ने संबोधन में सभी शोधार्थियों को जनजातीय भाषा पर विशेष अध्ययन करने पर जोर दिया.
डॉ शशि भूषण मिश्रा ने अपने संबोधन में संताली भाषा की शब्दों को बंगला भाषा एवं ओडिया भाषा के शब्दों के साथ तुलना करते हुए अपनी बातों को रखा. बसंत मिश्रा ने भी सभा को संबोधित करते हुए संताली भाषा और साहित्य पर ही अपनी बातें रखी. कोल्हान विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो डॉ गंगाधर पंडा ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कोल्हान विश्वविद्यालय की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग को अपनी विशेष उपलब्धि बताया.
उन्होंने इस विभाग से प्रकाशित 16 पुस्तकों की भी जिक्र किया, जिसके चलते नैक से विशेष सहयोग मिला. उन्होंने यह भी बताया कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में सबसे ज्यादा छात्र-छात्राएं उपस्थित रहते हैं.
कुलपति प्रो डॉ गंगाधर पांडा ने इस संगोष्ठी को सफलतापूर्वक आयोजन करने हेतु विभाग के शिक्षकों डॉ बसंत चाकी, निशोन हेंब्रम, सुभाष चंद्र महतो एवं डॉ अर्चना सिन्हा को विशेष सूत्रधार बताया. इस समापन समारोह को संचालन चंद्रमोहन टूडू ने किया जबकि प्रो. मुदिता चंद्रा विभाग अध्यक्ष हिंदी जमशेदपुर महिला विश्वविद्यालय जमशेदपुर ने सभी को धन्यवाद दिया. कार्यक्रम की समाप्ति राष्ट्रगान से किया गया.

