
उदित वाणी, रांची : स्वास्थ्य के क्षेत्र में एआई के बढ़ते प्रयोग और नवाचारों की कड़ी के बीच राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान [रिम्स] और बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान [बीआईटी] मेसरा के शोधकर्ताओं ने दो अत्याधुनिक स्वास्थ्य उपकरण विकसित किया है. जो उपचार को आसान बनायेगा और गंभीर रूप से बीमार व अक्षम मरीजों का जीवन आसान करेगा. इनमें पहली तकनीक एआई आधारित स्मार्ट आला है. जो शरीर के अंदरूनी अंगों यथा हृदय, फेफड़ा, लीवर की सूक्ष्म ध्वनियों में छिपे संकेतों को पकड़कर बीमारी की पहचान करने में सक्षम है.
इसके माध्यम से मरीजों को शुरुआती स्तर पर ही बीमारी की जानकारी मिल जाएगी और एमआरआई या सिटी स्कैन जैसी महंगी जांचों की भी जरूरत नहीं पड़ेगी. रिम्स के डॉक्टर द्वारा मरीजों पर किए गए परीक्षणों में इसने सटीक परिणाम दिया है. इसके पेटेंट के लिए भी आवेदन कर दिया गया है. रिम्स के क्रिटिकल केयर यूनिट के विभागाध्यक्ष व डीन रिसर्च डा प्रदीप कुमार भट्टाचार्य, रिम्स ट्रामा लैब प्रभारी डा साकेत वर्मा और बीआईटी मेसरा के इंजीनियर डा सितांशु साहू के नेतृत्व में चिकित्सकों और इंजीनियरों की टीम ने मिलकर इस उपकरण को विकसित किया है.
दो वर्षों के शोध के बाद तैयार इस तकनीक में अब तक 300 से अधिक प्रकार की ध्वनियों का डाटाबेस जोड़ा जा चुका है. दूसरी ओर बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान मेसरा के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी प्रणाली विकसित की है. जो दिमाग के विद्युत संकेतों को व्हीलचेयर के संचालन से जोड़ती है. यह तकनीक ब्रेन कंप्यूटर इंटरफेस [बीसीआई] पर आधारित है. जिसके माध्यम से दिमागी संकेतों से व्हीलचेयर को नियंत्रित किया जा सकता है.
यह तकनीक विशेष रूप से उन मरीजों के लिए उपयोगी है. जो रीढ़ की चोट, स्ट्रोक, एएलएस या सेरेब्रल पाल्सी जैसी स्थितियों के कारण चलने-फिरने या हाथ-पैर हिलाने-डुलाने में असमर्थ हैं. ऐसे मरीज के मन की इच्छा के अनुरूप यह व्हील चेयर मूव कर सकती है. इस शोध को अंतरराष्ट्रीय जर्नल न्यूरोसाइंस [एल्सेवियर] में प्रकाशित किया गया है. इसे भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद का भी सहयोग प्राप्त है.

