
उदित वाणी, जमशेदपुर : जमशेदपुर में ट्रैफिक चेकपोस्ट की वीडियो बनाने पर ट्रैफिक डीएसपी द्वारा जेल भेजने की मौखिक चेतावनी का मामला अब कानूनी और संवैधानिक बहस का रूप ले चुका है. आरटीआई कार्यकर्ता अंकित आनंद द्वारा विधानसभा समिति को पत्र लिखे जाने के बाद, अब शहर के वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर कुमार पप्पू ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर पुलिस के इस आदेश की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
संविधान के आर्टिकल 19 का उल्लंघन?
एडवोकेट सुधीर कुमार पप्पू का कहना है कि पुलिस की यह चेतावनी पहली नज़र में कानून-व्यवस्था की सख्ती लग सकती है, लेकिन यह सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (Article 19) द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है. उनके अनुसार, हर नागरिक को सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली गतिविधियों को रिकॉर्ड करने का अधिकार है, विशेषकर जब वे सार्वजनिक प्राधिकरणों के कार्यों से जुड़ी हों.
पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल
अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यदि पुलिस की चेकिंग प्रक्रिया पूरी तरह वैध और पारदर्शी है, तो वीडियो बनाने से डर क्यों? उन्होंने कहा कि कई बार पुलिस बिना किसी अधिसूचना के अचानक चेकिंग शुरू कर देती है और वाहनों के पीछे दौड़ती है, जिससे दुर्घटना का खतरा रहता है. ऐसे में वीडियो रिकॉर्डिंग सार्वजनिक सुरक्षा और पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक माध्यम है. वीडियो कई बार अवैध वसूली या अनुचित व्यवहार को उजागर करने में भी सहायक होते हैं.
मनमानी कार्रवाई और समानता का सिद्धांत
कानून के समक्ष समानता (Article 14) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य की कोई भी कार्रवाई मनमानी नहीं होनी चाहिए. बिना किसी स्पष्ट कानून या सरकारी अधिसूचना के “वीडियो बनाने पर जेल” जैसी ‘ब्लैंकेट’ धमकी देना असंवैधानिक है. उन्होंने सुझाव दिया कि पुलिस को केवल उन मामलों में कार्रवाई करनी चाहिए जहाँ जानबूझकर कानून से बचने में मदद की जा रही हो, न कि हर प्रकार की रिकॉर्डिंग को अपराध घोषित करना चाहिए.
लोकतंत्र में विश्वास की आवश्यकता
अंत में, एडवोकेट सुधीर कुमार पप्पू ने जोर दिया कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस और जनता के बीच विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है. सख्ती कानून के दायरे में और नागरिक अधिकारों का सम्मान करते हुए होनी चाहिए, अन्यथा यह तंत्र नागरिक स्वतंत्रताओं पर “चेकमेट” साबित हो सकता है.

