उदित वाणी, जमशेदपुर: लौहनगरी और आसपास के क्षेत्रों में इस वर्ष 15 अप्रैल को बंगाली नववर्ष ‘पोइला बैसाख’ (Bengali New Year 1433) पूरे पारंपरिक उत्साह के साथ मनाया जाएगा. बंगाली कैलेंडर के पहले महीने ‘बोइशाख’ के इस प्रथम दिन को लेकर मानगो, साकची, बिष्टुपुर, कदमा और टेल्को समेत पूरे शहर में तैयारियां जोरों पर हैं. यह पर्व न केवल एक नए साल की शुरुआत है, बल्कि यह आस्था, संस्कृति और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है.
उगते सूर्य की पूजा और ‘हाल खाता’ की परंपरा
नववर्ष के दिन की शुरुआत तड़के उगते सूर्य के दर्शन और ईष्ट देव की पूजा से होती है.
• धार्मिक अनुष्ठान: शहर के बेल्डीह कालीबाड़ी जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में सुबह 4 बजे से ही विशेष पूजा अर्चना शुरू हो जाएगी.
• व्यापारिक शुरुआत: व्यापारियों के लिए यह दिन ‘हाल खाता’ (नए बही-खाते) की शुरुआत का होता है, जहाँ वे अपने ग्राहकों को आमंत्रित कर नए आर्थिक वर्ष की प्रतीकात्मक शुरुआत करते हैं.
स्वाद का संगम: पांता भात और हिल्सा मछली
पोइला बैसाख का त्यौहार पारंपरिक व्यंजनों के बिना अधूरा है. इस दिन खास तौर पर पांता भात, तली हुई हिल्सा मछली, प्याज और हरी मिर्च का सेवन किया जाता है. इसके साथ ही छेने की मिठाइयां और मांस-मछली के विभिन्न पकवान इस उत्सव की खास पहचान हैं.
बेल्डीह कालीबाड़ी में दो दिवसीय भव्य उत्सव (14-15 अप्रैल)
बंगाली नववर्ष के अवसर पर बेल्डीह कालीबाड़ी में विशेष इंतजाम किए गए हैं:
• सजावट: पूरे मंदिर परिसर को आकर्षक रोशनी और टुनी बल्बों से सजाया गया है.
• प्रसाद वितरण: 14 अप्रैल की शाम से ही श्रद्धालुओं के बीच हिंदी-बंगाली कैलेंडर और प्रसाद का वितरण शुरू होगा.
• सांस्कृतिक संध्या: 15 अप्रैल की शाम मंदिर परिसर में धार्मिक संगीत कार्यक्रम का आयोजन होगा, जिसके लिए 75 कुर्सियों और एक सुसज्जित मंच की व्यवस्था की गई है.
मिलानी क्लब में सजेगी सुरों की महफिल: 19 अप्रैल को भव्य कार्यक्रम
बिष्टुपुर स्थित मिलानी क्लब में बंगाली संवत 1433 के स्वागत में 19 अप्रैल को सांस्कृतिक संध्या का आयोजन होगा.
• कोलकाता के कलाकार: प्रसिद्ध गायक शांतनु अधिकारी और गायिका देवश्री तरफदार अपनी प्रस्तुतियों से समां बांधेंगे.
• सम्मान समारोह: इस अवसर पर समाज की विशिष्ट विभूतियों— तपोस मित्रा, पीके नंदी, अरिजीत सरकार और मौसमी भट्टाचार्य को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया जाएगा.
• ऐतिहासिक संदर्भ: पोइला बैसाख की परंपरा मुगल सम्राट अकबर के समय से जुड़ी है, जो आज बंगाली पहचान और गौरव का उत्सव बन चुका है.


