
उदित वाणी,जमशेदपुर : मानगो नगर निगम के मेयर पद के चुनाव ने एक ऐसा नाटकीय मोड़ ले लिया है, जिसने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के भीतर ‘अपनों’ के बीच ही तलवारें खींच दी हैं. एक ओर जहाँ भाजपा ने रणनीतिक रूप से पार्टी नेता नीरज सिंह की पत्नी संध्या सिंह को मौन समर्थन देने का मन बनाया था, वहीं स्थानीय विधायक सरयू राय (जदयू) ने उन्हें सीधे तौर पर ‘एनडीए प्रत्याशी’ घोषित कर मामले को नया आयाम दे दिया है. इस घोषणा के बाद अब भाजपा के दो दिग्गज नेताओं -पूर्व महानगर अध्यक्ष राजकुमार श्रीवास्तव और अविनाश सिंह राजा -के राजनीतिक रुख को लेकर शहर में चर्चाओं का बाजार गर्म है.
साख की लड़ाई: क्या पीछे हटेंगे ‘पुराने चावल’?
भाजपा के पूर्व जिला अध्यक्ष राजकुमार श्रीवास्तव की पत्नी कुमकुम श्रीवास्तव और भाजपा नेता अविनाश सिंह राजा की पत्नी ज्योति सिंह भी मेयर पद की मजबूत दावेदार मानी जा रही हैं. दोनों ही नेताओं का मानगो क्षेत्र में अपना व्यक्तिगत जनाधार और कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज है. सरयू राय और भाजपा के आधिकारिक ‘मौन समर्थन’ के बाद अब इन दोनों नेताओं के सामने धर्मसंकट की स्थिति है:
विकल्प एक: पार्टी के संकेत को शिरोधार्य करते हुए अपनी पत्नियों का नामांकन वापस लेना या चुनाव न लड़ना.
विकल्प दो: जनता और कार्यकर्ताओं के दबाव का हवाला देते हुए निर्दलीय या स्वतंत्र रूप से चुनाव मैदान में डटे रहना.
सरयू राय का ‘एनडीए’ दांव व भाजपा की मजबूरी
जानकारों का मानना है कि विधायक सरयू राय द्वारा संध्या सिंह को एनडीए प्रत्याशी घोषित करना एक सोची-समझी रणनीति है. इससे उन्होंने भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी को दरकिनार कर एक ‘संयुक्त मोर्चे’ की तस्वीर पेश करने की कोशिश की है. हालांकि, पार्टी के आधिकारिक सिंबल पर चुनाव न होने के कारण राजकुमार श्रीवास्तव और अविनाश सिंह राजा जैसे नेताओं के पास मैदान में बने रहने का तकनीकी रास्ता खुला है. यदि ये दोनों नेता पीछे नहीं हटते हैं, तो मानगो में “भाजपा बनाम भाजपा” की स्थिति बन सकती है, जिसका सीधा फायदा इंडिया गठबंधन (कांग्रेस समर्थित सुधा गुप्ता) को मिल सकता है.
मंथन का दौर और नामांकन की घड़ी
फिलहाल, भाजपा के जिला से लेकर प्रदेश स्तर के नेता डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं. पार्टी के भीतर यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि “लक्ष्य कमल की मजबूती” है, न कि व्यक्तिगत पद. राजकुमार श्रीवास्तव और अविनाश सिंह राजा के समर्थकों के बीच फिलहाल असमंजस की स्थिति है. अब सबकी निगाहें नामांकन के अंतिम घंटों पर टिकी हैं -क्या ये नेता पार्टी अनुशासन के आगे झुकेंगे या अपनी राजनैतिक जमीन बचाने के लिए ‘दो-दो हाथ’ करने का फैसला करेंगे?

