
जमशेदपुर: विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) सिंहभूम विभाग ने सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का स्वागत करते हुए इसे संविधान की मूल भावना और सामाजिक न्याय को मजबूत करने वाला बताया है। विभाग के मंत्री अरूण सिंह ने कहा कि यह फैसला विधि के शासन को सुदृढ़ करता है और समाज में पारदर्शिता लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
धर्मांतरण के बाद SC श्रेणी पर स्पष्टता
अरूण सिंह ने कहा कि न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया है कि धर्म परिवर्तन के बाद कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे में उसे SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुरूप है, जिसमें केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही SC श्रेणी में शामिल किया गया है।
क्या है सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुसूचित जाति का दर्जा ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और विशेष परिस्थितियों के आधार पर दिया गया है, जो मूल रूप से कुछ विशेष धार्मिक समुदायों से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने कहा कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति उस सामाजिक ढांचे से बाहर हो जाता है, जिसके आधार पर उसे यह संवैधानिक संरक्षण मिला था। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति पुनः निर्धारित धर्मों में वापस आता है और सामाजिक रूप से स्वीकार किया जाता है, तो वह फिर से इस श्रेणी के लाभों के लिए पात्र हो सकता है।
‘धर्मांतरण के बाद लाभ लेने की प्रवृत्ति पर लगेगी रोक’
अरूण सिंह ने कहा कि इस फैसले से उन प्रवृत्तियों पर रोक लगेगी, जिनमें कुछ लोग धर्मांतरण के बाद भी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर संवैधानिक लाभ लेने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार, इस निर्णय से धर्मांतरण से जुड़े गलत तरीकों पर भी अंकुश लगेगा।
आरक्षण और पहचान को लेकर उठाए सवाल
अरूण सिंह ने कहा कि कुछ धार्मिक समूह एक ओर अपने धर्म को समतावादी बताते हैं, वहीं दूसरी ओर ‘दलित ईसाई’ और ‘दलित मुस्लिम’ जैसे शब्दों के माध्यम से आरक्षण की मांग करते हैं। उन्होंने इसे विरोधाभासी बताते हुए कहा कि ऐसे प्रयासों से धर्मांतरण को बढ़ावा देने की कोशिश की जाती है।
ऐतिहासिक संदर्भ और अधिकारों का आधार
उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति के अधिकार और संरक्षण का उद्देश्य ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय को दूर करना है, जो विशेष रूप से हिन्दू समाज की संरचना में उत्पन्न हुआ था। ऐसे में धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति उस सामाजिक संदर्भ से भी अलग हो जाता है, जिसके आधार पर उसे ये अधिकार दिए गए थे।
पुनः धर्म में वापसी पर अधिकार की संभावना
अरूण सिंह ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पुनः हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म को अपनाता है और समाज द्वारा उसे स्वीकार किया जाता है, तभी वह फिर से अनुसूचित जाति के अधिकारों का पात्र बन सकता है।
‘अधिकारों की रक्षा के लिए अभियान चलाएगा विहिप’
उन्होंने कहा कि यह निर्णय सामाजिक समरसता और न्याय की स्थापना की दिशा में महत्वपूर्ण है। विहिप कार्यकर्ता देशभर में ऐसे लोगों की पहचान करेंगे, जिन्होंने अनुसूचित समाज के अधिकारों का गलत लाभ लिया है, ताकि उन अधिकारों को वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचाया जा सके।

