
उदित वाणी, सरायकेला: झारखंड के सरायकेला जिले का भुरकुली गांव एक बार फिर आस्था, साहस और परंपरा की अनूठी मिसाल का गवाह बना है.हर वर्ष की तरह इस साल भी यहाँ आयोजित ‘चड़क पूजा’ ने श्रद्धा की पराकाष्ठा को पार कर दिया.चैत्र मास में शुरू होने वाले इस अनुष्ठान का समापन पाट संक्रांति के दिन हुआ, जहाँ ‘भोक्ता’ कहलाने वाले श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य के प्रति ऐसी भक्ति दिखाई जिसे देख लोग दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं।
लोहे के कांटे और जलते अंगारे: कठिन है यह डगर
भुरकुली की चड़क पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि शारीरिक कष्टों के बीच अटूट विश्वास की परीक्षा है.पूजा के दौरान श्रद्धालु (भोक्ता) अपने शरीर में लोहे के नुकीले कांटे चुभाकर ऊंचाइयों पर झूलते हैं.इतना ही नहीं, जलते हुए अंगारों पर नंगे पैर चलना और जीभ को लोहे की छड़ से छेदकर तपस्या करना इस परंपरा का मुख्य हिस्सा है.इन रोंगटे खड़े कर देने वाले करतबों को देखने के लिए दूर-दराज से हजारों की भीड़ यहाँ पहुँचती है।
1908 से शुरू हुआ चमत्कारी इतिहास
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा की जड़ें 118 साल पुरानी हैं.कहा जाता है कि वर्ष 1908 में भुरकुली गांव में एक शिवलिंग चमत्कारी रूप से प्रकट हुआ था.इसके बाद से ही यहाँ ‘विश्वनाथ महादेव’ की पूजा के साथ चड़क पूजा की शुरुआत हुई.पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी निष्ठा के साथ निभाई जा रही है, जो आधुनिक दौर में भी फीकी नहीं पड़ी है।
आस्था और अंधविश्वास के बीच बहस
हालांकि, शरीर को इस हद तक कष्ट देने वाली इन क्रियाओं को लेकर समाज में हमेशा दो गुट रहे हैं.जहाँ एक पक्ष इसे गहरी साधना और सांस्कृतिक विरासत मानता है, वहीं दूसरा पक्ष इसे अंधविश्वास करार देता है.इन बहसों से दूर, भुरकुली के ग्रामीणों के लिए यह उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का प्रतीक है.पूरे गांव में मेले जैसा माहौल रहता है और लोग इसे अपने पूर्वजों की अमूल्य धरोहर के रूप में सहेज रहे हैं।

