
उदित वाणी, चाईबासा: कोल्हान विश्वविद्यालय सभागार में कोल्हान प्रमंडल के तीनों जिलों पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम व सरायकेला खरसावां के मुखियाओं के लिए सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें झारखंड सरकार की ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह भी शामिल हुई। मंत्री दीपिका पांडेय सिंह, सिंहभूम सांसद जोबा माझी, निदेशक राजेश्वरी बी, उपायुक्त चंदन कुमार और उप विकास आयुक्त उत्कर्ष कुमार ने दीप प्रज्ज्वलित कर सम्मेलन का शुभारंभ किया। इस मौके पर जगन्नाथपुर विधायक सोनाराम सिंकू, जिला परिषद की अध्यक्ष लक्ष्मी सुरेन व उपाध्यक्ष रंजीत यादव मौजूद रहे। कार्यक्रम के दौरान तीनों जिलों के उत्कृष्ट कार्य करने वाले मुखिया को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के दौरान सांसद और विधायक ने मुखिया के अलावा अन्य पंचायत प्रतिनिधियों को उनके अधिकार और विकास कार्य में भागीदारी के साथ जिले में पेयजल की समस्या को मंत्री के सामने रखा। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि राज्य की 70 फ़ीसदी आबादी गांव में रहती है। हेमंत सरकार इसे सशक्त बनाने की कोशिश कर रही है। इसी कड़ी में आज का यह कार्यक्रम आयोजित किया गया है, ताकि मुखिया एक दूसरे से जानकारी साझा करके सीख सकें और बेहतर तरीके से कार्य करें। उन्होंने कहा कि कोल्हान की स्वशासन व्यवस्था से पूरे राज्य को सीखने की जरूरत है। पेसा कानून पर चर्चा करते हुए मंत्री ने कहा कि गठबंधन सरकार में इसे बहुत समझने के बाद लागू किया है।
देश के अन्य राज्यों में जो कानून लागू है उसमें हमारा पैसा कानून सबसे बेहतर है। यह कानून ग्राम सभा को पूर्ण अधिकार प्रदान करेगा और मजबूती देगा। उन्होंने मुखियाओं से अपील किया कि पेसा कानून को लेकर किसी के बहकावे में नहीं आए। मंत्री ने कहा कि पंचायत समिति को भी पांचवें और 15 में वित्त आयोग की राशि का 15 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा, ताकि वे विकास कार्य करा सकें। जिला परिषद की भी हिस्सेदारी है। उन्होंने कहा कि वार्ड सदस्य को कैसे सशक्त बनाना है, इसके बारे में भी सरकार विचार कर रही है। उन्होंने कहा कि कुछ राशि भेजी जा चुकी है और अगले 10-15 दिनों में पूरी राशि बैंक खातों में पहुंच जाएगी। प्रत्येक पंचायत को 12 लाख से लेकर 60 लाख रुपए तक मिलेगा। पेयजल की समस्या पर उन्होंने कहा कि यह सरकार की भी प्राथमिकता में है, इसलिए सभी को विशेष ध्यान देने की जरूरत है। मंत्री ने कहा कि प्रधान के लोगों की मांग थी कि आबुआ आवास योजना का छत टिन शेड, एस्बेस्टस या फिर मिट्टी के खपरैल से बनाने की अनुमति दी जाए। परंपरागत रूप से लोगों को ऐसे आवास में रहना पसंद है। हेमंत सरकार ने इस पर विचार करते हुए लाभुक को विकल्प चुनने का मौका देने का निर्णय लिया है। यानी लाभुक अपनी पसंद से आवास का निर्माण कर सकता है।
कार्यक्रम के बाद पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने कहा कि एक राजनीति के तहत पिछले कई सालों से केंद्र सरकार ने मनरेगा को बंद करने की तैयारी शुरू कर दी थी। बिना किसी कारण के इसे बंद करके नई योजना को लागू कर दिया गया। इससे झारखंड में एक विशेष परिस्थिति पैदा हो गई है। केंद्र सरकार से सहयोग नहीं मिल रहा है। राज्य का जो बकाया है उसे नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विधानसभा सत्र के दौरान हमारी सरकार ने प्रस्ताव पारित करके भेजा था कि मनरेगा को जारी रखा जाए। मनरेगा कर्मियों की जो मांग है उसे भी मंत्रालय को भेजा गया था। लेकिन केंद्र सरकार की ओर से तकनीकी त्रुटियां बताते हुए मनरेगा को बंद करने का काम किया गया और मांग के अनुसार पैसा भी नहीं दिया गया। हमारी मांग थी कि कम से कम जून महीने तक मनरेगा को चालू रखा जाए ताकि योजनाओं को पूर्ण किया जा सके और लंबित भुगतान पूरा हो सके। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
पंचायती राज अधिनियम 2001 की समीक्षा के लिए राज्य स्तरीय समिति में जनजातीय समुदाय के किसी भी व्यक्ति को शामिल नहीं किया गया। इस सवाल के जवाब पर मंत्री ने कहा कि इसमें जनजातीय समाज के लोग भी हैं और विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है।

