
चांडिल : झारखंड की सांस्कृतिक धरती सरायकेला एक बार फिर भक्ति और परंपरा के रंगों में सराबोर हो उठी है। नीमडीह प्रखंड के लुपुंगडीह पंचायत स्थित बाना गाँव में चैत्र संक्रांति के पावन अवसर पर पारंपरिक चड़क पूजा का आयोजन पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ किया गया।
भक्तिमय हुआ वातावरण
जमींदार परिवार के स्व. महेंद्र सिंह द्वारा स्थापित प्राचीन शिव मंदिर में आयोजित इस पूजा के दौरान पूरा क्षेत्र ‘ॐ नमः शिवाय’ के जयकारों से गुंजायमान रहा। सोमवार को बाना और पितकी गाँव के प्रत्येक घर में महिलाओं ने मंगल कामना के साथ पूजा-अर्चना की। पंडित संतोष पांडेय एवं भोक्ता मंडली ने घर-घर जाकर विधिवत मंत्रोच्चारण के साथ ‘भोक्ता पाठ’ संपन्न कराया, जिससे संपूर्ण वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया।
छऊ नृत्य: पौराणिक कथाओं का जीवंत संगम
चैत्र पर्व की रात जागरण का विशेष महत्व रहा, जहाँ विश्व प्रसिद्ध छऊ नृत्य की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कलाकारों ने अपने सधे हुए मुखौटों और शारीरिक मुद्राओं के माध्यम से पौराणिक कथाओं को जीवंत कर दिया, जो क्षेत्र की समृद्ध कलात्मक विरासत का प्रमाण है।
साहस की पराकाष्ठा: ‘भक्ता फुड़ा’ अनुष्ठान
इस उत्सव का सबसे रोमांचक और विस्मयकारी हिस्सा ‘भक्ता फुड़ा’ रहा। अपनी मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धालुओं ने अटूट विश्वास के साथ अपनी पीठ पर लोहे के अंकुश (हुक) चुभवाए और लगभग 100 फीट ऊंचे चड़क खंभे पर बंधकर हवा में चक्कर लगाए। इस दृश्य को देख उपस्थित जनसमूह की सांसें थम गईं, लेकिन भक्तों के चेहरों पर भय के स्थान पर केवल महादेव के प्रति समर्पण दिखाई दिया।
विरासत को सहेजने की कोशिश
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहने का एक जरिया है। बुजुर्गों का मानना है कि ऐसे अनुष्ठान नई पीढ़ी को अपनी गौरवशाली संस्कृति और इतिहास से रूबरू कराते हैं।
आस्था, साहस और कला का यह अनूठा संगम सरायकेला की पहचान को और भी प्रगाढ़ बनाता है।

