उदित वाणी, जमशेदपुर: कला और संस्कृति के प्रमुख केंद्र रबीन्द्र भवन, साकची में शनिवार को विश्वकवि रबीन्द्र नाथ टैगोर की 165वीं जयंती के अवसर पर टैगोर सोसाइटी के तत्वावधान में तीन दिवसीय रंगारंग कार्यक्रम की शुरुआत हुई. इस उत्सव के माध्यम से शहरवासियों ने गुरुदेव की कालजयी रचनाओं और उनके मानवतावादी विचारों को याद किया.
प्रभातफेरी से हुई उत्सव की शुरुआत
कार्यक्रम के पहले दिन सुबह 5.30 बजे एक भव्य प्रभातफेरी निकाली गई. यह प्रभातफेरी टैगोर सोसाइटी प्रांगण से शुरू होकर बागे जमशेद चौक, साकची गोलचक्कर और बंगाल क्लब चौक होते हुए जुबिली पार्क मार्ग से वापस रबीन्द्र भवन पहुंची. इसमें टैगोर स्कूल ऑफ आर्ट्स और टैगोर एकेडमी के सैकड़ों विद्यार्थियों व शिक्षकों ने उत्साह के साथ भाग लिया.
डॉ. एच. एस. पाल का संबोधन: महामानव थे गुरुदेव
इस अवसर पर टैगोर सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. एच. एस. पाल ने गुरुदेव को नमन करते हुए कहा कि उनका जन्म मानव जाति के उत्थान के लिए हुआ था. उन्होंने कहा, “गुरुदेव के साहित्य और कला में न केवल सृजन है, बल्कि समस्त प्राणी मात्र के लिए करुणा और दया का भाव भी है. उनकी रचनाओं में प्रकृति सजीव हो उठती है.” इसके पश्चात छात्र-छात्राओं ने सामूहिक ‘रबीन्द्र संगीत’ प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया.

सांस्कृतिक संध्या: कला और संगीत का संगम
उत्सव की पहली संध्या सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के नाम रही. टैगोर स्कूल ऑफ आर्ट्स की विभिन्न शाखाओं ने मनमोहक प्रदर्शन किए:
केबल एवं बारीडीह शाखा: नृत्य गीती आलेख्य ‘सोकोल काजेर काजि’.
कदमा शाखा: नृत्य गीती आलेख्य ‘शान्ति कोरो बरिसोनो’.
परसुडीह शाखा: नृत्य गीती आलेख्य ‘तुमाय आमाय मिलोन होलो’.
टेल्को शाखा: ‘आमि नारि, आमि मोहिओषि’ की प्रस्तुति.
रबीन्द्र भवन मुख्य केंद्र: छात्र-छात्राओं द्वारा ‘बाणी ऐक, सूरचन्दो ओनेक’ का शानदार मंचन.

युवा पीढ़ी को जोड़ने का प्रयास
कार्यक्रम के अंत में टैगोर सोसाइटी के महासचिव आशीष चौधुरी ने बताया कि इन आयोजनों का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और गुरुदेव की रचनाओं से जोड़ना है. उन्होंने कहा कि यह श्रद्धांजलि युवाओं को कला और साहित्य की गहराई समझाने का एक सार्थक प्रयास है.


