
उदित वाणी, जमशेदपुर : शहर की सड़कों पर इन दिनों सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरे हैं ऑटो चालकों की मनमानी और नियमों की अनदेखी। शहर में बढ़ते ट्रैफिक जाम और सड़क हादसों की आशंका को लेकर लोग परेशान हैं। खासकर टाटानगर स्टेशन के बाहर की स्थिति तो बेहद भयावह होती जा रही है। स्टेशन के एग्जिट गेट पर सवारी बटोरने की होड़ में ऑटो चालकों की भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि यातायात पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है।
नियम है कि ऑटो चालक केवल निर्धारित ऑटो स्टैंड पर ही खड़े हों और वहीं से सवारी उठाएँ। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। सड़कों के बीचों-बीच ऑटो रोककर सवारी बिठाने का सिलसिला आम हो गया है। इससे न केवल ट्रैफिक जाम लगता है बल्कि दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ जाती है। कई बार देखा गया है कि इसी अव्यवस्था के कारण एंबुलेंस तक को जाम में फँसना पड़ता है, जिससे गंभीर मरीजों की जान पर भी खतरा मंडराने लगता है।
टाटानगर स्टेशन के बाहर की सबसे अधिक अव्यवस्था
टाटानगर स्टेशन, जो पूरे राज्य का एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है, वहाँ रोजाना हजारों यात्री आते-जाते हैं। लेकिन बाहर जैसे ही यात्री निकलते हैं, ऑटो चालकों की भीड़ उन पर टूट पड़ती है। हर कोई पहले सवारी पकड़ने और अधिक किराया वसूलने की होड़ में रहता है। जिसके कारण स्टेशन गेट के बाहर हर दिन घंटों ट्रैफिक जाम लगता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्टेशन से ट्रेन छूटने या आने के समय यह स्थिति और भी खराब हो जाती है। गाड़ियों की लंबी कतारें लग जाती हैं और यातायात पुलिस की मौजूदगी के बावजूद ऑटो चालक अपनी मनमानी से बाज़ नहीं आते। यात्रियों को भी भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
वर्दी का नियम भी केवल कागजों में
सरकार द्वारा सख्त आदेश है कि सभी ऑटो चालक ड्यूटी के दौरान निर्धारित हरे-पीले रंग की वर्दी पहनें। इससे न केवल पहचान आसान होती है बल्कि यात्रियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। लेकिन जमशेदपुर में शायद ही कोई ऑटो चालक इस नियम का पालन करता दिखे।
अक्सर चालकों को बिना वर्दी और कई बार बिना आईडी कार्ड सवारी ढोते देखा जा सकता है। कई बार यात्रियों से छिनतई या विवाद जैसी घटनाएँ होने पर शिकायत की प्रक्रिया भी मुश्किल हो जाती है क्योंकि चालक की पहचान आसानी से नहीं हो पाती। प्रशासन की कार्रवाई और ढिलाई।
यातायात पुलिस समय-समय पर चेकिंग अभियान चलाती है और चालकों पर चालान भी करती है। लेकिन यह अभियान स्थायी समाधान नहीं है। अभियान थोड़े दिन चलता है और फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाता है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासन की सख्ती केवल कागजों तक सिमटी हुई है। अगर वास्तव में नियमों को लागू करने की इच्छा शक्ति होती तो आज यह स्थिति नहीं होती। जाम के दौरान आरपीएफ की भूमिका और संभावित समाधान
टाटानगर स्टेशन के बाहर जब जाम की स्थिति बनती है, तो रेलवे पुलिस बल (आरपीएफ) को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए कि वे इस मामले में सक्रियता दिखाएं। फिलहाल आरपीएफ की उपस्थिति अधिकतर औपचारिक सी नजर आती है, जबकि उन्हें ट्रैफिक का प्रबंधन करना चाहिए। इसके अलावा, ऑटो चालकों को नियमित तरीके से निर्धारित स्थानों पर ऑटो लगाने की अनुमति दी जानी चाहिए, जिससे सवारी चढ़ाने और उतारने में सुव्यवस्था बन सके।
आरपीएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी, इंस्पेक्टर राकेश मोहन, इस समस्या पर कहते हैं, “हम इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। वर्तमान में हम नियमित चेकिंग अभियान चला रहे हैं ताकि ऑटो चालकों को नियमों के पालन के लिए प्रेरित किया जा सके। हम जल्द ही एक स्थायी योजना के तहत ऑटो स्टैंड की व्यवस्था पर काम करेंगे, ताकि यात्री भी आसानी से सवारी प्राप्त कर सकें और ट्रैफिक जाम की समस्या खत्म हो सके।” सड़क दुर्घटना की आशंका बढ़ती जा रही है
ऑटो चालकों द्वारा अनियमित सवारी चढ़ाने के कारण यह संभावना बढ़ जाती है कि कभी कोई बड़ा हादसा हो जाए। व्यस्त सड़क पर बिना उचित स्थान निर्धारित किए ऑटो खड़ा कर देना और यात्रियों का बैठना-उतरना न केवल चालकों के लिए जोखिम है, बल्कि अन्य वाहन चालकों और पैदल यात्रियों के लिए भी संकटपूर्ण हो जाता है। कई बार छोटी-मोटी टक्करे तो दर्ज हो चुकी हैं, परंतु अभी तक किसी बड़ी दुर्घटना की सूचना नहीं आई।
एक ऑटो चालक, जो वर्षों से टाटानगर स्टेशन के पास ऑटो चला रहे हैं, बताते हैं, “हम अपने परिवार का पेट पालने के लिए यह काम कर रहे हैं। लेकिन सरकार की ओर से स्पष्ट व्यवस्था नहीं होने की वजह से मजबूरी में मनमानी करना पड़ता है। हम चाहते हैं कि एक स्पष्ट ऑटो स्टैंड बनाकर हमें सुविधा दी जाए।” जमशेदपुर के टाटानगर रेलवे स्टेशन के बाहर ऑटो चालकों की मनमानी, नियमों की अनदेखी और वर्दी न पहनना यात्री जीवन को असुरक्षित बना रहा है। आरपीएफ और स्थानीय प्रशासन को मिलकर एक ठोस योजना बनाकर समस्या का त्वरित समाधान निकालना होगा। तभी यात्री सुरक्षित, व्यवस्थित और सुविधाजनक परिवहन सेवा का लाभ उठा सकेंगे। अन्यथा यह समस्या भविष्य में एक गंभीर सार्वजनिक संकट में तब्दील हो सकती है।

