
उदित वाणी, जमशेदपुर : साहित्य, सिनेमा एवं कला संस्था ‘सृजन संवाद’ ने तीन सिने-निर्देशकों की शताब्दी मनाई. वक्ताओं ने ऋत्विक घटक, राज कपूर एवं गुरुदत्त के सिनेमा पर बात की. ऑस्ट्रेलिया से अनीता बरार, कोचीन से डाल्टन एवं लंदन से तेजेंद्र शर्मा ने राज कपूर पर अपने विचार रखे. डॉ. विजय शर्मा ने बताया कि सृजन संवाद इन निर्देशकों पर अलग-अलग कार्यक्रम कर चुका है. अनीता बरार ने गुरुदत्त की दो फ़िल्मों ‘बाज़ी’ एवं ‘प्यासा’ के माध्यम से गुरुदत्त के निर्देशीय सूझ-बूझ, कौशल को विस्तार से बताया.
गुरुदत्त के फ़्रेम, उनकी फ़िल्मों के गीत की चर्चा करते हुए बताया कि गुरुदत्त अपनी फ़िल्मों में किरदारों के मनोवैज्ञानिक हालात, कैमरा, छाया द्वारा एक अलग दुनिया में ले जाते हैं. उनकी फ़िल्म के गाने कहानी को आगे बढ़ाते हैं. डॉल्टन ने कहा कि जीनियस घटक अपनी भावनाओं एवं आदर्शों के गुलाम थे. कम्युनिज्म शक्ति का खेल है जिसकी कागज समानता की बात वास्तविकता में न होगी और न ही है.
डॉल्टन ने प्रश्न किया, ‘स्वर्णरेखा’ में कौन प्रोटगनिस्ट है? यह फ़िल्म घटक को दिखाती है. अच्छी-बुरी दो अलग चीजें नहीं हैं. यह निर्देशक अपने पात्रों से अपनी बातें निकालता है. तेजेंद्र शर्मा ने राज कपूर की ‘श्री 420’ पर बोलते हुए कहा, दर्शक राज कपूर की फ़िल्म देखने टिकट खरीद कर जाता है, जबकि ऐसे निर्देशक हुए हैं जिनकी फ़िल्में पैसे देने पर भी सामान्य दर्शक नहीं देखना चाहेगा. उनकी फ़िल्म देख कर गरीब होने की इच्छा होती है न कि गरीबों से घृणा. फ़िल्म के गानों, कहानी पर बोलते हुए उन्होंने निर्देशक की विशेषताओं को रेंखांकित किया. राज कपूर सेंसिबल और सेंसिटिव फ़िल्म बनाते थे इसीलिए दर्शक उनकी फ़िल्मों से कनेक्ट हो पाता था.

