
उदित वाणी, जमशेदपुर : बीते 12 जून को साकची थाना के समक्ष जन सुविधा मंच द्वारा किए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बाद दर्ज की गई एफआईआर मामले में अहम प्रगति हुई है. मंगलवार को एडीजे-5 मंजू कुमारी की अदालत ने सुनवाई करते हुए भाजपा नेता अमित अग्रवाल समेत सभी 18 आरोपियों को अग्रिम जमानत प्रदान कर दी. अदालत के इस फैसले से मंच के सदस्यों और उनके समर्थकों को बड़ी राहत मिली है.
इन सभी को मिली अग्रिम जमानत
कोर्ट से अग्रिम जमानत पाने वाले आरोपियों में अमित अग्रवाल, कंचन दत्ता, राहुल कुमार, सौरभ कर्मकार, अभिषेक श्रीवास्तव, शशांक शेखर, प्रकाश दुबे, पृथ्वी पाल सिंह, संतोष कुमार सिंह, रितेश झा, सौरव कुमार, सुमित श्रीवास्तव, कौस्तव रॉय, नवजोत सिंह सोहेल, अमित सिंह, दिलीप पासवान, राकेश कुमार और आशीष अग्रवाल शामिल हैं. अदालत में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता प्रकाश झा ने इन सभी की पैरवी की.
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और न ही कोई सरकारी कार्य बाधित हुआ, न ही कोई हिंसा हुई. अधिवक्ता प्रकाश झा ने कोर्ट में कहा, “जब जन सुविधा मंच के सदस्य साकची क्षेत्र में व्याप्त अवैध धंधों के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए थाना के समक्ष एकत्र हुए थे, तो उन्होंने न किसी प्रकार की हिंसा की और न ही थाने के भीतर प्रवेश किया. ऐसे में उनके खिलाफ प्राथमिकी का कोई औचित्य नहीं बनता.”
12 जून को हुआ था प्रदर्शन, दर्ज हुआ था केस
गौरतलब है कि जन सुविधा मंच ने 12 जून को साकची क्षेत्र में बढ़ते अनैतिक कार्यों, अवैध शराब बिक्री, नशाखोरी, अतिक्रमण और आपराधिक गतिविधियों के खिलाफ साकची थाना का घेराव किया था. प्रदर्शन के बाद थाना प्रभारी आनंद मिश्रा ने भाजपा नेता अमित अग्रवाल समेत 18 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया था. प्राथमिकी में सरकारी कार्य में बाधा डालने और अन्य धाराओं का उल्लेख किया गया था.
‘लोकतंत्र का गला घोंटने की कोशिश’ : अमित अग्रवाल
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए जन सुविधा मंच के संयोजक और भाजपा नेता अमित अग्रवाल ने कहा, “साकची क्षेत्र में अपराध और अवैध धंधों को लेकर जब आम जनता की आवाज़ उठी, तब पुलिस ने जन आंदोलन को दबाने का प्रयास किया. हमारा प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था. एक लाठी तक नहीं थी, सड़क जाम नहीं हुआ और हम हाथों में तिरंगा लेकर शांतिपूर्वक बैठे थे. इसके बावजूद एफआईआर दर्ज कर हमें डराने की कोशिश की गई.”
उन्होंने आरोप लगाया कि थाना प्रभारी ने दुर्भावनावश यह मामला दर्ज कराया. अग्रवाल ने इसे लोकतंत्र का गला घोंटने की साजिश करार दिया. उन्होंने कहा, “यह हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन है. जनता की आवाज़ को दबाने के लिए कानून का सहारा लिया गया, जो दुर्भाग्यपूर्ण है.”
‘जन आंदोलन को नहीं दबाया जा सकता’
जन सुविधा मंच के अन्य सदस्यों ने भी कहा कि जनता की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता. मंच के वरिष्ठ सदस्य नवजोत सिंह सोहेल ने कहा, “हम साकची में जनहित के मुद्दों को लेकर लगातार आवाज़ उठा रहे हैं. चाहे अतिक्रमण हो या नशाखोरी, मंच हर स्तर पर सक्रिय है. पुलिस प्रशासन यदि ऐसे आंदोलनों को कुचलने का प्रयास करेगा, तो जनता खुद जवाब देगी.”
अग्रिम जमानत मिलने के बाद जन सुविधा मंच के सदस्यों को स्थानीय जनता और व्यापारी समुदाय से भी समर्थन मिला है. कई सामाजिक संगठनों ने मंच के प्रयासों को सराहा और प्रशासन से मांग की कि भ्रष्टाचार और अपराध पर लगाम लगाई जाए, न कि आवाज़ उठाने वालों को निशाना बनाया जाए.
क्या था मामला?
प्रदर्शन के दौरान जन सुविधा मंच के कार्यकर्ता तिरंगा लेकर थाना के समक्ष जमा हुए थे. मंच का आरोप था कि साकची क्षेत्र में लंबे समय से अवैध शराब बिक्री, जुए और अन्य आपराधिक गतिविधियों को संरक्षण दिया जा रहा है, लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है. मंच ने तत्काल कार्रवाई की मांग की थी. प्रदर्शन के कुछ घंटों बाद ही साकची थाना प्रभारी आनंद मिश्रा ने एफआईआर दर्ज कर भाजपा नेता समेत 18 लोगों को नामजद किया, जिससे राजनीतिक तापमान भी बढ़ गया था.
कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी
हालांकि अदालत से अग्रिम जमानत मिल गई है, लेकिन मामला अभी न्यायालय में लंबित है. अगली सुनवाई की तिथि आने वाले दिनों में तय होगी. बचाव पक्ष अब इस एफआईआर को निरस्त करने की याचिका पर विचार कर सकता है.
पुलिस की चुप्पी
इस पूरे मामले पर साकची थाना प्रभारी आनंद मिश्रा ने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है. हालांकि सूत्रों की मानें तो पुलिस का मानना है कि प्रदर्शन की आड़ में कुछ असामाजिक तत्वों ने सरकारी कार्य में हस्तक्षेप किया था, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लेकिन कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत मिलने के बाद पुलिस की दलीलों पर भी सवाल उठ रहे हैं.
सत्य की जीत की ओर एक कदम
जन सुविधा मंच को मिली अग्रिम जमानत केवल कानूनी राहत नहीं, बल्कि एक प्रतीक है कि यदि आंदोलन सच्चाई के पक्ष में हो और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन किया गया हो, तो न्यायालय भी उस आवाज़ को महत्व देती है. अब देखना यह होगा कि आने वाली सुनवाइयों में मंच किन कानूनी पहलुओं पर अपना पक्ष रखता है और पुलिस किन साक्ष्यों के साथ अदालत में प्रस्तुत होती है. मगर फिलहाल, यह मंच और इसके कार्यकर्ताओं के लिए एक बड़ी नैतिक जीत मानी जा रही है.

