
उदित वाणी जमशेदपुर: दक्षिण पूर्व रेलवे के अंतर्गत आने वाला टाटानगर रेलवे स्टेशन इन दिनों विकास योजनाओं के साथ-साथ विवादों के कारण भी चर्चा में है। एक ओर भारतीय रेल और रेल मंत्रालय द्वारा हजारों करोड़ रुपये की लागत से स्टेशन को विश्वस्तरीय बनाने की दिशा में काम किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रेलवे लैंड विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार चक्रधरपुर रेल मंडल (सीकेपी डिवीजन), जिसे रेलवे के सबसे अधिक राजस्व देने वाले मंडलों में गिना जाता है, के कुछ अधिकारी कथित रूप से अनियमितताओं में लिप्त बताए जा रहे हैं। मंत्रालय और रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों का पालन जमीनी स्तर पर होता नजर नहीं आ रहा, जिससे विकास के दावे खोखले प्रतीत हो रहे हैं।
अतिक्रमण बना सबसे बड़ी बाधा
प्रधानमंत्री की विकसित भारत योजना के तहत टाटानगर स्टेशन के आधुनिकीकरण का कार्य जारी है, लेकिन अतिक्रमण की समस्या ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया है। रेलवे की जमीन पर अवैध कब्जों के खिलाफ कार्रवाई तो हो रही है, लेकिन कई मामलों में अतिक्रमणकारी कोर्ट का सहारा ले रहे हैं। इससे परियोजनाओं की गति प्रभावित हो रही है।
इसी बीच रेलवे लैंड विभाग की कार्यशैली पर सवाल और गहरे हो गए हैं। आरोप है कि जहां एक ओर छोटे दुकानदारों और स्थानीय लोगों को हटाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर बड़े स्तर पर हो रहे अवैध निर्माणों को नजरअंदाज किया जा रहा है।
प्रदीप मिश्रा चौक पर अवैध निर्माण का मामला
स्टेशन के समीप स्थित प्रदीप मिश्रा चौक क्षेत्र इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। यहां प्लॉट नंबर-1, जुगसलाई स्थित रेलवे भूमि पर ‘सौभाग्य होटल’ के नाम से प्रसिद्ध स्थान पर कथित रूप से अवैध निर्माण कार्य चल रहा है।
जानकारी के अनुसार लीज होल्डर आलोक कुमार अग्रवाल द्वारा अपने निर्धारित क्षेत्र से बाहर जाकर निर्माण कराया जा रहा है। इतना ही नहीं, लीज शर्तों के विपरीत यहां शराब दुकान का संचालन भी किया जा रहा है, जबकि रेलवे नियम इसकी अनुमति नहीं देते।
गौरतलब है कि स्टेशन क्षेत्र में पूर्व में संचालित तीन शराब दुकानों को रेलवे ने नियमों के तहत हटाया था। इसके बावजूद इस तरह की गतिविधियां विभागीय कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।
रात के अंधेरे में भी जारी गतिविधियां
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि उक्त क्षेत्र में दिन के साथ-साथ रात के समय भी निर्माण और अन्य गतिविधियां जारी रहती हैं। आरोप है कि अवैध कब्जे को वैध दिखाने के लिए आसपास के व्यवसायों को स्थानांतरित किया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि एक पटाखा दुकान को हटाकर लीज होल्डर ने अपने वैध क्षेत्र का विस्तार किया और अब उस स्थान पर नए व्यवसाय की तैयारी चल रही है।
नियमों की अनदेखी या मिलीभगत?
रेलवे के नियमों के अनुसार कोई भी लीज होल्डर अपनी जमीन को किराए पर नहीं दे सकता और न ही निर्धारित सीमा से बाहर निर्माण कर सकता है। इसके बावजूद इस प्रकार की गतिविधियों का जारी रहना कई सवाल खड़े करता है।
आरोप यह भी है कि लगभग 2000 वर्गफीट रेलवे भूमि पर अवैध कब्जा किया गया है, जो भविष्य में स्टेशन विकास परियोजना के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
स्थानीय प्रशासन की चुप्पी भी सवालों में
इस पूरे मामले में स्थानीय पुलिस और प्रशासन की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। इतने बड़े पैमाने पर हो रही गतिविधियों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई न होना चर्चा का विषय बना हुआ है।
विकास बनाम अनियमितता
टाटानगर स्टेशन का विकास जहां क्षेत्र की आधारभूत संरचना को नई दिशा दे सकता है, वहीं इस तरह के आरोप परियोजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करते हैं। यदि समय रहते इन अनियमितताओं पर रोक नहीं लगी, तो न केवल सरकारी संसाधनों की क्षति होगी, बल्कि जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ेगा।
अब देखना यह होगा कि रेलवे प्रशासन इन आरोपों को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वास्तव में लैंड विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।

