
उदित वाणी, रांची: बिरसा मुंडा केंद्रीय कारा होटवार में बंद माओवादियों के सबसे बड़े पोलित ब्यूरो सदस्य एक करोड़ रुपये के इनामी रहे 80 वर्षीय प्रशांत बोस उर्फ किशन दा उर्फ मनीष उर्फ बूढ़ा उर्फ निर्भय मुखर्जी उर्फ काजल उर्फ महेश का शुक्रवार की सुबह रिम्स में निधन हो गया। प्रतिबंधित नक्सली संगठन के सबसे बड़े थिंक टैंक एवं टुंडी व पीरटांड़ से पूरे झारखंड को माओवाद का किला बनाने वाले प्रशांत बोस का असली नाम प्रबल बोस था। प्रशांत बोस की शुक्रवार सुबह करीब 6 बजे सांस लेने में कठिनाई हुई और तत्काल कड़ी सुरक्षा के बीच उन्हें रिम्स ले जाया गया। अस्पताल में डॉक्टरों की स्पेशल टीम ने उनका इलाज शुरू किया गया। लेकिन स्थिति में सुधार नहीं हुआ और करीब 10 बजे डॉक्टरों ने उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी। इसके बाद जेल और अस्पताल प्रशासन ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए रिम्स में मजिस्ट्रेट की नियुक्ति कर दी है तथा सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस प्रशासन ने अलर्ट भी जारी कर दिया है। प्रशांत बोस की पत्नी शीला मरांडी ने जेल प्रशासन को बताया कि प्रशांत बोस के घर में आगे पीछे कोई नहीं है। प्रशांत बोस का एक भाई अमेरिका में है। जिन्हें सूचना देने का प्रयास किया जा रहा है। जेल प्रशासन ने इस संबंध में रांची के उपायुक्त से भी बातचीत की है। बताया गया कि शव लेने अगर कोई नहीं आएगा तो शव का अंतिम संस्कार 72 घंटे इंतजार के बाद पूरे सम्मान के साथ प्रशासन द्वारा कराया जायेगा। गौरतलब है कि प्रशांत बोस को 12 नवंबर 2021 को सरायकेला-खरसावां जिले के कांड्रा टोल ब्रिज के पास उनकी पत्नी शीला मरांडी के साथ गिरफ्तार किया गया था। 1990 के दशक में उनकी माओवादी घटनाओं में सक्रियाता बढ़ी। इसके बाद हत्या, आपराधिक साजिश सहित सैकड़ों माओवादी घटनाओं में उनकी संलिप्तता रही। सारंडा में 16 जवानों की शहादत समेत कई बड़ी घटनाओं में उसकी संलिप्तता का आरोप था।
प बंगाल के जमींदार परिवार से थे, पर अब आगे-पीछे कोई नहीं
प्रशांत बोस मूल रूप से पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले के जादवपुर स्थित 7/12 सी विजयगढ़ कॉलोनी का निवासी थे। वह एक जमींदार परिवार से थे। नक्सली लीडर अमूल्य सेन एवं कन्हाई चटर्जी के साथ वर्ष 1970 में कोलकाता से टुंडी आकर प्रशांत बोस ने नक्सलवाद की इस क्षेत्र में नींव रखी थी। उस दौर में यहां वह किसान दा के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने टुंडी एवं गिरिडीह जिले के पीरटांड़ को एक जोन बनाकर यहां नक्सलवाद का संगठन खड़ा किया था। जो बाद में पारसनाथ जोन बना।
माओवादी संगठन में अहम पहचान प्रशांत बोस महासचिव नंबला केशव राव के बाद थे दूसरे सबसे प्रभावशाली
माओवादी संगठन में अहम पहचान प्रशांत बोस को माओवादी संगठन में महासचिव नंबला केशव राव के बाद दूसरे सबसे प्रभावशाली माने जाते थे। संगठन की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो के सदस्य रहे और ईस्टर्न रीजनल ब्यूरो के सचिव भी थे। प्रशांत बोस रणनीतिक फैसलों और संगठन की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका के लिए जाने जाते थे। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार वह झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में 200 से अधिक नक्सली वारदातों का मास्टरमाइंड थे। उनके नेतृत्व में कई बड़े हमले और संगठनात्मक निर्णय लिए गए। जो नक्सली गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण माने जाते थे।
नावाटांड़ के शीला मरांडी से किया था शादी, कई भाषाओं के थे जानकार
प्रशांत बोस ने नावाटांड़ की रहने वाली शीला मरांडी से विवाह किया था। शीला मरांडी भाकपा माओवादी की महिला संगठन नारी मुक्ति संघ की संस्थापक अध्यक्ष थी। जानकार बताते हैं कि प्रशांत बोस अंग्रेजी, हिंदी, बांग्ला, संथाली, मुंडारी, हो समेत कई भाषाओं के जानकार थे। उनके भाषणों से प्रभावित होकर सैकड़ों आदिवासी युवक मुख्यधारा से हटकर नक्सलवाद की ओर मुड़ गए थे। प्रशांत बोस वर्ष 2004 में सीपीआई-एमएल [पीपुल्स वॉर] के साथ विलय होकर सीपीआई [माओवादी] बनने से पहले माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया [एमसीसीआई] के प्रमुख थे। प्रशांत बोस भाकपा [माओवादी] की केंद्रीय समिति पोलित ब्यूरो और केंद्रीय सैन्य आयोग [सीएमसी] के भी सदस्य थे।

