
उदित वाणी, रांची: झारखंड राज्य में 421 महिला सुपरवाइजरों की नियुक्ति का मार्ग अब प्रशस्त हो गया है। झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस संबंध में बड़ी राहत देते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर लगी अंतरिम रोक हटा दी है। मुख्य न्यायाधीश एम. एस. सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने महिला सुपरवाइजर पदों पर शत-प्रतिशत महिलाओं की नियुक्ति को प्राथमिक रूप से संवैधानिक करार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मामला आरक्षण से जुड़ा नहीं, बल्कि राज्य की नीतिगत व्यवस्था का हिस्सा है।
कार्य की प्रकृति के आधार पर उचित वर्गीकरण
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि यह पद विशेष रूप से महिलाओं के लिए सृजित किया गया है। इसे आरक्षण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, बल्कि कार्य की प्रकृति और लक्षित समूह के आधार पर उचित वर्गीकरण माना जाएगा।
अदालत ने कहा कि एकीकृत बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) योजना के तहत गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की देखभाल जैसे कार्यों को देखते हुए यह पद महिलाओं के लिए अधिक उपयुक्त है।
संवैधानिक प्रावधानों का दिया हवाला
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 15(3) के तहत राज्य सरकार महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान कर सकती है और यह अधिकार अनुच्छेद 16 से सीमित नहीं होता।साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा मुख्यतः अनुच्छेद 16(4) के तहत पिछड़े वर्गों के आरक्षण पर लागू होती है, जबकि वर्तमान मामला उस श्रेणी में नहीं आता।
एकल पीठ के आदेश को किया निरस्त
गौरतलब है कि 28 अगस्त 2025 को एकल पीठ ने शत-प्रतिशत आरक्षण को लेकर सवाल उठाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। खंडपीठ ने उस आदेश को निरस्त कर दिया है।हालांकि, अदालत ने महिला सुपरवाइजरों की शैक्षणिक योग्यता से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई के लिए मामले को एकल पीठ के पास भेज दिया है। साथ ही निर्देश दिया है कि नियुक्ति पत्र में यह उल्लेख किया जाए कि अंतिम निर्णय के अधीन नियुक्ति प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
19 मार्च को पूरी हुई थी सुनवाई
इस मामले में 19 मार्च को सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे अब सुनाया गया है।

