
उदित वाणी, जमशेदपुर: जमशेदपुर लौहनगरी के पारसी समुदाय ने शनिवार को पूरे उत्साह और भक्तिभाव के साथ ‘नवरोज’ (पारसी नववर्ष) का स्वागत किया। शहर के लगभग 140 सदस्यों वाले इस छोटे लेकिन जीवंत समुदाय ने प्रार्थना, मेल-मिलाप और पारंपरिक पकवानों के साथ नए साल का जश्न मनाया।
दिन की शुरुआत बिष्टुपुर स्थित अग्नि मंदिर (अगियारी) में विशेष प्रार्थनाओं के साथ हुई। समुदाय के सदस्यों ने नए साल में सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। जमशेदपुर पारसी एसोसिएशन के मार्गदर्शन में आयोजित इस उत्सव में परंपराओं का खास ध्यान रखा गया। एसोसिएशन के अध्यक्ष बेली बोधनवाला, चेयरमैन पी. बत्तीवाला और टाटा स्टील के उपाध्यक्ष (एचआर) सह एसोसिएशन के उपाध्यक्ष जुबिन पालिया सहित अन्य पदाधिकारियों ने इस मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
नवरोज के केंद्र में ‘हफ्त-सीन’ की परंपरा रही, जिसमें ‘एस’ अक्षर से शुरू होने वाली सात वस्तुओं—सिब (सेब), सब्जी, सिर (लहसुन), सिरका, सुमक, संजद (सूखे मेवे) और समनु (मीठा हलवा)—को सजाया गया। ये वस्तुएं स्वास्थ्य, समृद्धि और नए जीवन का प्रतीक मानी जाती हैं। एसोसिएशन के ट्रस्टी शावक पटेल ने बताया कि नवरोज का अर्थ है ‘नया दिन’, जो न केवल ईरानी नववर्ष है बल्कि वसंत विषुव (वर्नल इक्वीनोक्स) का भी प्रतीक है।
शाम का जश्न और सामुदायिक एकजुटता
उत्सव का दूसरा पड़ाव शाम को पारसी कॉलोनी स्थित अर्देशिर आर. दलाल हॉल में देखने को मिला। यहां आयोजित सामुदायिक मिलन समारोह में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने विभिन्न खेलों में हिस्सा लिया। इसके बाद एक भव्य सामुदायिक रात्रिभोज का आयोजन हुआ, जहाँ पारंपरिक व्यंजनों का लुत्फ उठाते हुए सदस्यों ने एक-दूसरे को नववर्ष की बधाई दी।
घटती जनसंख्या की चिंता
जश्न के बीच समुदाय ने अपनी घटती संख्या पर भी मंथन किया। जमशेदपुर में अब लगभग 140 और पूरे झारखंड में करीब 200 पारसी सदस्य ही बचे हैं। सचिव यिम डोटिवाला और अन्य सदस्यों के अनुसार, कोलकाता जैसे शहरों में भी पारसियों की संख्या में भारी गिरावट आई है। बावजूद इसके, जमशेदपुर का पारसी समाज अपनी विरासत को संजोने और शहर के विकास में अपनी भागीदारी निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया।

