
उदित वाणी, जमशेदपुर : जमशेदपुर के सीतारामडेरा क्षेत्र में प्रकृति पर्व सरहुल का त्यौहार पारंपरिक श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया. आदिवासियों के इस प्रमुख पर्व के दौरान पूरा क्षेत्र मांदर की थाप और सांस्कृतिक रंगों में सराबोर नजर आया. उत्सव की शुरुआत पाहन (पुजारी) को उनके निवास से ससम्मान सरना स्थल तक लाने की रस्म के साथ हुई, जहाँ पाहन के पैर धोकर उनका स्वागत किया गया.
आगामी वर्षा का पूर्वानुमान और विशेष पूजा
पूजा की मुख्य प्रक्रिया शुरू होने से पहले एक प्राचीन और महत्वपूर्ण विधि अपनाई गई. यहाँ दो मिट्टी के घड़ों में रखे पानी का सूक्ष्म निरीक्षण किया गया. इस पारंपरिक पद्धति के माध्यम से आने वाले मानसून और वर्षा की स्थिति का आकलन किया जाता है. इसके पश्चात पाहन ने चावल, सिंदूर और सखुआ (साल) के पवित्र फूलों के साथ विधि-विधान से पूजा संपन्न की.
आस्था और भक्ति का अनूठा दृश्य
अनुष्ठान के समापन पर महिलाओं ने पाहन पर कलश से जल अर्पित कर उनका अभिनंदन किया. यह पाहन द्वारा पूरे समाज के कल्याण के लिए की गई प्रार्थना के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक भावुक तरीका है. इसके बाद पारंपरिक सफेद और लाल रंग की साड़ियों में सजी महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक सरना स्थल की परिक्रमा की.
सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक जुलूस
ढोल, नगाड़ों और मांदर की थाप पर थिरकते हुए ग्रामीणों का हुजूम मुख्य सरना स्थल से दूसरे पुराने सरना स्थल की ओर प्रस्थान कर गया. वहां भी पूर्वजों की रीतियों के अनुसार अनुष्ठान दोहराए गए. सरहुल का यह भव्य आयोजन न केवल प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का माध्यम बना, बल्कि इसने सामुदायिक एकजुटता की मिसाल भी पेश की.

