
उदित वाणी, जमशेदपुर: आदिवासी सेंगेल अभियान ने प्रकृति पूजक आदिवासियों की विशिष्ट पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अपनी आवाज बुलंद कर दी है. अभियान ने केंद्र सरकार से आगामी जनगणना में “सरना धर्म कोड” को अलग से शामिल करने और इसे संवैधानिक मान्यता देने की मांग को लेकर आंदोलन तेज करने का एलान किया है.
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: सालखन मुर्मू
अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. इसके बावजूद करोड़ों प्रकृति पूजक आदिवासियों को अब तक अपनी अलग धार्मिक पहचान नहीं मिल पाई है. उन्होंने इसे आदिवासियों के मौलिक अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन बताया.
प्रकृति पूजा और विशिष्ट पहचान
मुर्मू ने जोर देकर कहा कि आदिवासियों की परंपराएं, रीति-रिवाज और पूजा पद्धति प्रचलित संगठित धर्मों से पूरी तरह भिन्न हैं. आदिवासी मूर्ति पूजा के बजाय जल, जंगल, जमीन और प्रकृति की उपासना करते हैं. इसलिए, उन्हें हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई की श्रेणियों में रखना उनके अस्तित्व के साथ अन्याय है. “सरना धर्म” को अलग मान्यता मिलना उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए अनिवार्य है.
धार्मिक स्थलों की मुक्ति की मांग
धार्मिक कोड के साथ-साथ अभियान ने गिरिडीह स्थित मरांग बुरु (पारसनाथ पहाड़) का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया है. सालखन मुर्मू ने मांग की है कि मरांग बुरु सहित देश के अन्य प्रमुख आदिवासी धार्मिक स्थलों को अतिक्रमण से मुक्त किया जाए और उनका प्रबंधन पूर्णतः आदिवासियों को सौंपा जाए.
सरकार से त्वरित कार्रवाई की अपील
आदिवासी सेंगेल अभियान ने केंद्र और राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस दिशा में जल्द ही कोई सकारात्मक ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में देशव्यापी विरोध प्रदर्शन किया जाएगा. अभियान ने जनगणना प्रपत्र में सरना धर्म के लिए अलग कॉलम सुनिश्चित करने की अपील की है.

