
उदित वाणी, रांची : भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि वे एसआईआर (SIR) के मुद्दे पर झारखंड के मतदाताओं को गुमराह कर रहे हैं. श्री साहू ने कहा कि मुख्यमंत्री गरीब, आदिवासी और मूलवासियों का नाम लेकर अपने ‘हिडन एजेंडा’ को साध रहे हैं और अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं.
भ्रामक और आधारहीन हैं मुख्यमंत्री के बयान
आदित्य साहू ने मुख्यमंत्री के उस बयान को पूरी तरह गलत बताया जिसमें उन्होंने भाजपा पर एसआईआर की आड़ में आदिवासियों और पिछड़ों को उनके मताधिकार, राशन और पेंशन से वंचित करने का आरोप लगाया था. साहू ने कहा कि मुख्यमंत्री बौखला गए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनके कार्यकाल में फर्जी तरीके से बसाए गए मतदाताओं का पत्ता साफ हो जाएगा.
एसआईआर: चुनाव आयोग की एक नियमित प्रक्रिया
प्रदेश अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि देश में एसआईआर कोई नई बात नहीं है. यह चुनाव सुधार का हिस्सा है जो आजादी के बाद से अब तक 13 बार किया जा चुका है. उन्होंने कहा, “2004 तक कई बार एसआईआर हुआ, तब कांग्रेस की सरकारें थीं और किसी ने आपत्ति नहीं जताई. अब मोदी सरकार के समय इस पर सवाल क्यों? यह पूरी तरह चुनाव आयोग का काम है जिसमें किसी राजनीतिक दल का हस्तक्षेप नहीं होता.”
झारखंड में मत प्रतिशत की असामान्य वृद्धि पर उठाए सवाल
भाजपा नेता ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2014 से 2019 के बीच देश में मतदाताओं की 9.3% वृद्धि हुई, जबकि झारखंड में यह केवल 6.2% थी. लेकिन 2019 से 2024 के बीच, जब राज्य में झामुमो-कांग्रेस की सरकार है, देश के 10.1% के मुकाबले झारखंड में यह वृद्धि 16.7% हो गई. उन्होंने आरोप लगाया कि यह राष्ट्रीय ग्रोथ से अधिक की वृद्धि घुसपैठियों को फर्जी तरीके से बसाने के कारण हुई है.
घुसपैठियों को संरक्षण देने का गंभीर आरोप
श्री साहू ने स्थानीय उदाहरण देते हुए सरकार को घेरा:
हैदरजोड़ी पंचायत (घाटशिला): जहाँ एक भी मुस्लिम आबादी नहीं है, वहां मंईयां सम्मान योजना के तहत 174 मुस्लिम महिलाओं को राशि दी गई.
चाकुलिया (पूर्वी सिंहभूम): एक गांव में बिना किसी मुस्लिम परिवार के 3000 मुस्लिम बच्चों के आधार कार्ड बन गए.
“वास्तविक मतदाताओं को डरने की जरूरत नहीं”
आदित्य साहू ने अंत में कहा कि बिहार और बंगाल में भी विपक्षी दलों ने ऐसा ही भ्रम फैलाया था, लेकिन किसी वास्तविक नागरिक का नाम नहीं कटा. झारखंड के वास्तविक अल्पसंख्यक भी एसआईआर से खुश हैं क्योंकि इससे बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों द्वारा उनके हक की हकमारी पर लगाम लगेगी. एसआईआर एक ‘फिल्टर’ है जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए आवश्यक है.

