
उदित वाणी, सरायकेला : सरायकेला-खरसावां जिले के चौका थाना अंतर्गत खुचीडीह स्थित कोहिनूर स्टील प्लांट के डायरेक्टर पर 241.9 करोड़ रुपये के बड़े घोटाले का आरोप लगा है. जानकारी के अनुसार कंपनी प्रबंधन ने पांच अलग-अलग बैंकों से लगभग 244 करोड़ रुपये का लोन लिया था.
दावा किया गया था कि इस पैसे से कोयले से चलने वाला थर्मल पावर प्रोजेक्ट तैयार किया जाएगा और बिजली का उत्पादन होगा. लेकिन जांच में खुलासा हुआ कि जिस जगह पर पावर प्लांट के लिए लोन लिया गया था वहां कोई काम शुरू ही नहीं हुआ. बल्कि कंपनी के डायरेक्टरों ने यह पैसा अन्य जगहों पर निवेश कर दिया.
जब खाते एनपीए घोषित हुए तो बैंकों ने जांच शुरू की और मामला सामने आया. अब यह पूरा मामला सीबीआई के पास है. सीबीआई ने इस घोटाले में कोहिनूर पावर लिमिटेड, डायरेक्टर विवेक दुग्गल, डायरेक्टर विजय बोधरा, डायरेक्टर प्रशांत बोथरा और एक बैंक अधिकारी को आरोपी बनाया है. हालांकि सूत्रों के मुताबिक सभी डायरेक्टर फिलहाल फरार बताए जा रहे हैं. मामले की सुनवाई कोलकाता हाई कोर्ट में चल रही है.
बताया जा रहा है कि कंपनी करीब तीन महीने पहले बंद हो चुकी है. पांच साल पहले कंपनी के मुख्य डायरेक्टर ने इसे कोलकाता के कारोबारी सोनू को लीज पर दे दिया था और वह इसे संचालित कर रहा था. लीज एग्रीमेंट खत्म होने के बाद कंपनी बंद कर दी गई. फिलहाल बंद पड़े कोहिनूर स्टील प्लांट में मजदूर पुराने सामान को बेचने का काम कर रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि थर्मल पावर प्रोजेक्ट के नाम पर लिया गया 244 करोड़ रुपये आखिरकार कहां खर्च किया गया.
सीबीआई की प्राथमिकी के अनुसार सरायकेला में कोहिनूर पावर को 66 मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाना था. वर्क एग्रीमेंट के आधार पर तीन बैंक और दो फायनेंस कंपनियों ने कोहिनूर पावर के पक्ष में सावधि ऋण की स्वीकृति दी थी. यह राशि वर्ष 2008 से 2013 के बीच जारी हुई. प्रोजेक्ट को 2013 में पूरा कर लेना था. बाद में इसे पहले जनवरी 2015 और फिर दिसंबर 2016 तक बढ़ा दिया गया. इसके बावजूद कंपनी ने परियोजना पूरी नहीं की. नतीजतन प्रोजेक्ट बंद हो गया.
एफआईआर के अनुसार, कोहिनूर पावर ने बैंकों के साथ हुए ऋण समझौते के अनुरूप अर्जित मार्जिन मनी का भुगतान नहीं किया, जबकि इस दौरान ऋण राशि का वितरण व उपयोग किया गया. कंपनी ने पावर प्रोजेक्ट में आवश्यक धन नहीं डाला. इस कारण प्रोजेक्ट फेल हो गया और ऋण खाते एनपीए हो गए. बैंकों की फॉरेंसिक ऑडिट में खुलासा हुआ कि कंपनी के निदेशकों ने बैंक द्वारा दी गई राशि का दुरुपयोग किया. राशि डायवर्ट की गई. इससे बैंकों को 241.90 करोड़ की राशि का गलत नुकसान हुआ.

