
उदित वाणी, जमशेदपुर : टाटा स्टील के ट्यूब डिविजन के घाटे में चलने के चलते प्रबंधन, मैनपावर के कम करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. इस बारे में प्रबंधन और टाटा वर्कर्स यूनियन के बीच हुई बैठक में प्रबंधन ने साफ कर दिया है कि ट्यूब डिविजन लगातार घाटे में चल रहा है. इसका तीन चौथाई बिजनेस वेंडर आधारित है, जबकि केवल एक चौथाई बिजनेस ही ट्यूब डिविजन का है. प्रबंधन का कहना है कि वेंडर आधारित बिजनेस की लागत कम है और उसमें घाटा नहीं है, जबकि ट्यूब डिविजन का बिजनेस लगातार घाटे में चल रहा है. ऐसे में मैनपावर को राइटसाइजिंग करना जरूरी हो गया है.
कंपनी को आर्थिक संकट से बाहर निकालने के लिए यह जरूरी है. इसे लेकर ट्यूब डिविजन के कार्यकारी निदेशक (ईआईसी) संजय साहनी ने टाटा वर्कर्स यूनियन के टॉप थ्री के साथ बैठक कर कंपनी की स्थिति की जानकारी दी. बैठक में प्रेजेन्टेशन के जरिए बताया गया कि ट्यूब डिविजन का उत्पादन एक मिलियन टन है, जिसमें से 75 फीसदी उत्पादन बाहरी वेंडरों द्वारा होता है. टाटा स्टील केवल इनके उत्पादों की क्वालिटी की जांच कर उसकी ब्रांडिंग करती है. वेंडर के जरिए उत्पाद बनाने का खर्च काफी कम होता है. ट्यूब डिविजन के आंतरिक उत्पादन की लागत काफी ज्यादा है. ऐसे में कंपनी के फिक्स्ड कॉस्ट को घटाने के लिए मैनपावर की कटौती करनी पड़ सकती है.
मैनपावर की समीक्षा
टाटा स्टील में मैनपावर के रेशनाइलेजन को लेकर सर्वे का काम चल रहा है. ब्लास्ट फर्नेस के साथ सीआरएम और आरएमएम विभागों के मैनपावर की व्यापाक समीक्षा की जा रही है. इन विभागों के कर्मियों की उत्पादकता का आकलन किया जा रहा है. यह भी देखा जा रहा है कि जहां मैनपावर ज्यादा है, उसे कैसे समायोजित किया जाएगा.

