उदित वाण, जमशेदपुर: आनंद मार्ग प्रचारक संघ के तत्वावधान में आयोजित महिला स्वयंसेवक प्रशिक्षण शिविर के दौरान गदरा स्थित आनंद मार्ग जागृति से एक भव्य शोभा यात्रा निकाली गई। यह शोभा यात्रा गदरा और गोविंदपुर की मुख्य सड़कों से होकर गुजरी, जिसमें सैकड़ों महिलाओं ने “बाबा नाम केवलम” कीर्तन की सुमधुर धुन पर चलते हुए समाज को एकजुट करने वाले कई प्रेरक नारे लगाए।
शोभा यात्रा में गूंजे सामाजिक एकता के नारे
शोभा यात्रा के दौरान महिलाओं ने समाज में नैतिकता और समरसता का संदेश देने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित नारे लगाए:
“दुनिया के नैतिकवादियो एक हो, एक हो”
“विश्व बंधुत्व कायम हो”
“जात-पात की करो विदाई आपस में है भाई-भाई”
“एक चूल्हा एक चौका एक है मानव समाज”
अध्यात्म के बिना शिक्षा अधूरी: महिला सन्यासिनियां
प्रशिक्षणार्थियों को संबोधित करते हुए आनंद मार्ग की महिला सन्यासिनी अवधूतिका आनंदनिष्ठा आचार्या, अवधूतिका आनंदनम्रता आचार्या एवं अवधूतिका आनंद सहिष्णुता आचार्या ने संयुक्त रूप से कहा कि “अध्यात्म के बिना शिक्षा अधूरी है।”
उन्होंने विस्तार से अपनी बातें रखते हुए कहा कि हमारी संस्कृति मूल रूप से आध्यात्मिक केंद्रित है। लेकिन लगभग 20 हजार वर्ष पुरानी इस महान सभ्यता को पाश्चात्य भोगवादी अपसंस्कृति के आक्रमण ने नष्ट कर दिया है। आज मानव समाज को आर्थिक शोषण के सूक्ष्म तरीके अपनाकर युवा तथा बच्चों को गुमराह किया जा रहा है।
हर मनुष्य को है शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का अधिकार
सन्यासिनियों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हर एक मनुष्य को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में विकसित होने का पूरा अधिकार है, और समाज का यह परम कर्तव्य है कि वह इस अधिकार को ठीक से स्वीकृति दे।
मार्गदर्शन का महत्व: उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य घृणा के योग्य नहीं है और न ही हम किसी को शैतान कह सकते हैं। मनुष्य तब शैतान या पापी बनता है, जब समाज में सही उपयोग, सही परिचालन और उचित पथ-निर्देशन का अभाव होता है। वह अपनी कुप्रवृत्तियों के कारण ही बुरा काम कर बैठता है। यदि उसकी इन कुप्रवृत्तियों को सप्रवृत्तियों की ओर मोड़ दिया जाए, तो वह शैतान नहीं रह जाएगा।
हर मनुष्य देव शिशु है; आनंद मार्ग की शिक्षा पद्धति जरूरी
उन्होंने समाज को एक नया दृष्टिकोण देते हुए कहा कि हर एक मनुष्य ‘देव शिशु’ है, और इसी तत्व को मन में रखकर समाज की हर कर्म पद्धति पर विचार करना उचित होगा। अतः आज के दौर में तथाकथित आधुनिक शिक्षा व्यवस्था की जगह आनंद मार्ग की नव्य-मानवतावादी ईश्वर केंद्रित शिक्षा पद्धति को अपनाने की अत्यंत आवश्यकता है।


