उदित वाणी,चतरा: टंडवा की सड़कें अब आम जनमानस के लिए सुरक्षित सफर नहीं, बल्कि “मौत का गलियारा” बन चुकी हैं. बुधवार, 6 मई की सुबह करीब 5:30 बजे ब्लॉक मोड़ के पास मजराही में एक तेज रफ्तार कोयला लदे हाइवा ने दो युवकों को रौंद दिया. टक्कर इतनी भीषण थी कि दोनों युवकों की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई. इस घटना ने एक बार फिर सिस्टम की लापरवाही और कोल ट्रांसपोर्टिंग के बेलगाम रफ्तार पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
हादसा नहीं, लापरवाही से की गई हत्या!
स्थानीय ग्रामीणों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है. लोगों का कहना है कि यह महज एक सड़क दुर्घटना नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लापरवाही से की गई हत्या है. कोयला ढोने वाले भारी वाहन (हाइवा) घनी आबादी वाले क्षेत्रों और बाजारों से बेकाबू रफ्तार में गुजरते हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि कोल कंपनियों के पास न तो कोई तय रूट है और न ही सुरक्षा के मानकों का पालन किया जा रहा है.
सड़क जाम और मुआवजे की मांग
हादसे के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने सड़क जाम कर प्रदर्शन शुरू कर दिया. मौके पर मौजूद स्थानीय मुखिया महेश मुण्डा ने कड़े शब्दों में कहा, “अब बहुत हो चुका, कोल हाइवा वाहनों का यह खूनी तांडव बंद होना ही चाहिए.” ग्रामीणों ने मृतक के परिजनों के लिए उचित मुआवजे और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की है. साथ ही, कोल कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगाने की चेतावनी दी है.
व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल
टंडवा की इन सड़कों पर हर सुबह किसी अनहोनी का डर बना रहता है. कोयला परिवहन में लगी कंपनियां अपने मुनाफे के लिए नियमों को ताक पर रख रही हैं. न तो वाहनों की स्पीड कंट्रोल करने की कोई व्यवस्था है और न ही प्रशासन द्वारा इनकी मॉनिटरिंग की जा रही है. घनी आबादी के बीच से दौड़ते ये भारी वाहन आए दिन किसी न किसी घर का चिराग बुझा रहे हैं.
कब रुकेगा यह खूनी सिलसिला?
सबसे बड़ा सवाल प्रशासन और सरकार से है—कब तक सड़कों पर यूं ही लाशें गिरती रहेंगी? क्या हर हादसे के बाद सिर्फ जाम और मुआवजे का आश्वासन ही अंतिम समाधान है? अगर अब भी भारी वाहनों के लिए वैकल्पिक मार्ग या सख्त नियम नहीं बनाए गए, तो यह “खूनी सड़क” और कितनी जिंदगियां निगलेगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.


