
उदित वाणी,जमशेदपुर: दलमा वन्यजीव अभयारण्य में आगामी 27 अप्रैल को मनाये जाने वाले ऐतिहासिक सेंदरा पर्व को लेकर इस बार तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है. वन्यजीव संरक्षण कानून की सख्ती और आदिवासियों की सदियों पुरानी सांस्कृतिक आस्था के बीच सीधा टकराव देखने को मिल रहा है. परसुडीह के गदड़ा में आयोजित बैठक में वन विभाग और सेंदरा समिति के बीच तीखी बहस ने इस मतभेद को उजागर कर दिया है.
शिकार पर प्रतिबंध बनाम सांस्कृतिक पहचान
गदड़ा स्थित दलमा राजा राकेश हेंब्रम के आवास पर हुई बैठक में वन विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि सेंदरा के दौरान जानवरों का शिकार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. रेंजर दिनेश चंद्र ने समाज से केवल पूजा-पाठ और प्रतीकात्मक परंपरा निभाने की अपील की है.

दूसरी ओर, दलमा राजा ने दोटूक कहा कि सेंदरा और शिकार एक-दूसरे के पूरक हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि चेकनाकों पर आदिवासियों को रोककर उनकी तलाशी ली गई या उन्हें परेशान किया गया, तो इसका व्यापक विरोध किया जाएगा.
वन विभाग की जवाबी रणनीति और शपथ
वन विभाग ने शिकार रोकने के लिए अपनी घेराबंदी तेज कर दी है. मानगो स्थित वन चेतना भवन में प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार और वाइल्ड लाइफ विंग के अधिकारियों ने 85 गांवों की ‘इको विकास समिति’ के साथ रणनीति बनाई.
जागरूकता अभियान: ग्रामीणों को वन्यजीवों की सुरक्षा की शपथ दिलाई गई.
संसाधनों का वितरण: अवैध शिकार पर नजर रखने के लिए समिति सदस्यों को टॉर्च और सोलर लैंप बांटे गए.
संरक्षण का संदेश: विभाग का तर्क है कि अब शिकार के बजाय प्रकृति संरक्षण के मॉडल को अपनाने का समय है.
25 अप्रैल से शुरू होगा सेंदरा का सफर
तय कार्यक्रम के अनुसार, 25 अप्रैल को दलमा राजा समर्थकों के साथ गदड़ा से प्रस्थान करेंगे. फदलोगोड़ा में पारंपरिक पूजा-अर्चना के बाद सेंदरा की औपचारिक शुरुआत होगी. जैसे-जैसे तारीख नजदीक आ रही है, प्रशासन के लिए धार्मिक संवेदनशीलता और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती बन गया है.

