
उदित वाणी, जमशेदपुर : रश्मि बिरहोर, जो माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से प्रेरित होकर आगे बढ़ीं, टाटा स्टील फाउंडेशन द्वारा संचालित ‘आकांक्षा’ पहल का हिस्सा रही हैं. रश्मि का सफर इस कार्यक्रम की दशक लंबी यात्रा का एक सशक्त प्रमाण है. बिरहोर जनजाति से ताल्लुक रखनेवाली रश्मि बिरहोर की हालिया सफलता, जो कक्षा 12वीं और स्नातक परीक्षा पास करने वाली पहली लड़की हैं ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है. झारखंड के रामगढ़ जिले से शुरू हुआ उनका यह सफर आगे बढ़कर शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है. आकांक्षा पहल की शुरुआत वर्ष 2012 में की गई थी और तब से लेकर अब तक फाउंडेशन ने 17 स्कूलों के साथ साझेदारी कर लगभग 524 पीवीटीजी समुदाय के बच्चों को बुनियादी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंचने में मदद की है.
बालिका ने 82 फीसदी अंक हासिल किया
एक अन्य प्रेरणादायक उदाहरण है छोटा बांकी गांव, पूर्वी सिंहभूम की बालिका बिरहोर का, जिन्होंने मैट्रिक परीक्षा में 82 प्रतिशत अंक प्राप्त कर अपनेसमुदाय में पहली पीढ़ी की मेधावी विद्यार्थी बनने का गौरव हासिल किया और कई लोगों को प्रेरित किया है. महामारी के चलते कक्षा 12वीं की परीक्षा में कठिनाइयों का सामना करने के बावजूद बालिका ने अच्छा प्रदर्शन किया और आगे चलकर भारत के प्रतिष्ठित कॉलेजों में से एक बेंगलुरु के नारायणा हृदयालय में नर्सिंग की पढ़ाई का चयन किया. वर्तमान में वह अपना पाठ्यक्रम पूरा कर रही है. इस सफर में उसे अपने भाई का भरपूर समर्थन मिला, जिन्होंने न केवल उसे आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया, बल्कि माता-पिता को भी सहमत किया कि वे अपनी बेटी को घर से दूर पढ़ने का मौका दें और उसके सपनों को साकार करने में मदद करें. लेकिन वह अकेली नहीं है. पिछले एक दशक में रश्मि और उसकी जैसी कई प्रेरणादायक कहानियां सामने आई हैं, जो बुनियादी शिक्षा के महत्व को एक बार फिर रेखांकित करती हैं.
झारखंड में 62 फीसदी संथाल परगना से
झारखंड में विशेष रूप से कमजोर आदिवासी समूहों (पीवीटीजी) की संख्या सबसे अधिक है, जिनमें से लगभग 62 प्रतिशत संथाल परगना क्षेत्र में रहते हैं. दलमा क्षेत्र में, जो फाउंडेशन के कार्यक्षेत्र के निकट है, तीन प्रमुख समुदाय निवास करते हैं – सबर, बिरहोर और पहाड़िया. अधिकांश पीवीटीजी समुदाय बेहद दुर्गम इलाकों में रहते हैं, विकास की मुख्यधारा से बहुत दूर, और जंगलों से मिलने वाले संसाधनों के सहारे जीवनयापन करते हैं. अपनी कमजोर स्थिति के चलते वे अक्सर शराब या अन्य कुप्रथाओं में उलझ जाते हैं और आजीविका या विकास के अवसरों का लाभ उठाने में असमर्थ रहते हैं.

