
उदित वाणी, जमशेदपुर: एवरेस्ट फतह कर शहर लौटी टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन (टीएसएएफ) की प्रशिक्षक अस्मिता दोरजी ने कहा कि भले ही बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट चढ़ने का उनका सपना साकार नहीं हो सका, मगर जो मौसम की प्रतिकूल स्थिति थी, उसमें एवरेस्ट फतह करना भी बेहद मुश्किल था.
लेकिन वह अपने दूसरे प्रयास में एवरेस्ट फतह करने में सफल रही. दोरजी मंगलवार को जेआरडी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के कॉन्फ्रेंस भवन में पत्रकारों के संग अपने अनुभवों को शेयर कर रही थी.
अस्मिता ने बताया कि कैंप फोर पर जाने के बाद उन्होंने फैसला लिया कि उन्हें ऑक्सीजन लेना है. अगर वह अपना फैसला नहीं बदलती और ऑक्सीजन नहीं लेती तो शायद आज इस दुनिया में नहीं होती. बकौल अस्मिता, तेज हवाएं चल रही थी. काफी केजुअलिटी हो रही थी. मैं हाइपोथर्मिया की शिकार हो रही थी. शरीर ठंडा हो रहा था.
ब्लड सर्कुलेशन कम हो रहा था. हमसे चला नहीं जा रहा था. ऐसे में मुझे अपना फैसला बदलना पड़ा और कैंप फोर से ऑक्सीजन लगाना पड़ा. मेरा जो शेरपा था, उसका भी सुझाव था कि मौसम की स्थिति को देखते हुए ऑक्सीजन लगाना जरूरी है. वह शेरपा अभी तक 16 बार माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर चुका है.
आगे क्या
अस्मिता दोरजी ने कहा कि अगले साल बिना ऑक्सीजन के वह कंजनजंघा जाने का प्रयास करेगी. यह भारत की सबसे ऊंची चोटी है. साथ ही हमारी कोशिश ट्रेकिंग और एडवेंचर स्पोर्ट्स को और प्रोत्साहित करने की होगी, क्योंकि यह जीवन में बेहद जरूरी है.
कोई जरूरी नहीं कि आप एवरेस्ट की चढ़ाई ही करें, अगर जिंदगी की चढ़ाई भी करनी हो तो आपको अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलना होगा. कॉरपोरेट वर्ल्ड में ट्रेकिंग को काफी बढ़ावा मिल रहा है क्योंकि इससे लीडरशिप और टीमवर्क जैसे गुर विकसित होते है.
एवरेस्ट फतह की खबर सुन बछेन्द्री मैम रो पड़ी
बकौल अस्मिता, जब वह एवरेस्ट फतह के बाद बेस कैंप पहुंची और वहां से बछेन्द्री मैम को फोन किया तो वह यह खबर सुन रो पड़ी. कहा-दो साल की तु्म्हारी मेहनत को आज पुरस्कार मिला है. उन्होंने मेरे उस फैसले को भी सही ठहराया, जब मैं कैंप फोर से ऑक्सीजन लेने का फैसला लिया.
अस्मिता, बछेन्द्री पाल के 1984 अभियान के शेरपा की बेटी है, जिन्हें उन्होंने अपने बच्चे की तरह पाला पोसा, जब पिता एक ट्रेकिंग के दौरान दुनिया से चल बसे.
शेरपा के योगदान को कोई कद्र नहीं करता
अस्मिता दोरजी ने बताया कि किसी भी ट्रेकर्स के एवरेस्ट पर पहुंचने में उसके शेरपा का अहम योगदान होता है. शेरपा को पहाड़ के बारे में जानकारी होती है. हर चुनौती का सामना कैसे किया जाय, उसके बारे में वह जानता है.
लेकिन जब कोई एवरेस्ट फतह करता है तो शेरपा को कोई श्रेय नहीं देता. शेरपा अपनी जिंदगी को दांव पर लगाकर समिट कराता है. उनके आय को कोई दूसरा स्त्रोत नहीं है.
हम बेहद खुशी है अस्मिता के इस सफलता पर-चाणक्य चौधरी
टाटा स्टील के वीपी कारपोरेट सर्विसेस चाणक्य चौधरी ने कहा कि हमें बेहद खुशी है कि अस्मिता ने दूसरे प्रयास में एवरेस्ट फतह किया. मौसम की खराबी के चलते बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट पर जाने का सपना भले ही पूरा नहीं हो पाया, मगर उस मुश्किल हालात में भी अस्मिता ने एवरेस्ट पर चढ़ाई कर हमारा नाम रौशन किया है.
वह भी उस दिन, जिस दिन 39 साल पहले बछेन्द्री पाल मैम ने एवरेस्ट की चढ़ाई की थी. टाटा स्टील खेल विभाग के प्रमुख हेमंत गुप्ता ने भी अस्मिता के उस फैसले को सही बताया कि उन्होंने मौसम की खराबी के बाद ऑक्सीजन के साथ एवरेस्ट पर जाने का फैसला लिया.
3 अप्रैल को एवरेस्ट फतह पर निकली थी अस्मिता
इस साल 3 अप्रैल को अपनी यात्रा शुरू करने वाली अस्मिता खुम्बू क्षेत्र से 8 दिन की ट्रेकिंग के बाद 14 अप्रैल को एवरेस्ट बेस कैंप पहुंचीं थी. 18 मई को अस्मिता ने अपना अंतिम शिखर अभियान शुरू किया.
खतरनाक खुम्बू हिमपात को पार करते हुए 19 मई को कैंप 2 पर पहुंची. उन्होंने 22 मई को रात 10 बजे अपनी अंतिम शिखर यात्रा शुरू की और 23 मई को सुबह 8:20 बजे शिखर पर सफलतापूर्वक पहुंची. एवरेस्ट फतह के बाद अस्मिता बेस कैंप आई. अस्मिता के साथ उनके शेरपा गाइड लक्फा नूरू भी थे, जो नेपाल के एक बहुत ही अनुभवी शेरपा गाइड है.
अस्मिता ने 8 चोटियों की चढ़ाई की है
अस्मिता ने 6000 मीटर से अधिक 8 चोटियों पर चढ़ाई कर चुकी हैं. उन्होंने माउंट सतोपंथ (7,075 मीटर), माउंट धर्मसूरा (6,420 मीटर), माउंट गंगोत्री 1 (6,120 मीटर), माउंट स्टोक कांगड़ी (6,070 मीटर), माउंट कांग यात्से 2 (6,270 मीटर), माउंट कांग यात्से 2 (6,270 मीटर) और जो ज़ोंगो (6,240 मी)पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की है.
उन्होंने सर्दियों में माउंट यूटी कांगड़ी (6,030 मीटर) पर चढ़ाई की और सर्दियों में माउंट स्टोक कांगड़ी का प्रयास किया और 5,700 मीटर तक पहुंच गई. इन अभियानों ने उनकी पर्वतारोहण यात्रा के निर्माण खंड के रूप में कार्य किया.
उच्चतम शिखर तक पहुंचने के लिए बहुत तैयारी की आवश्यकता होती है, जो उन्होंने अप्रैल 2019 में शुरू की थी. वह पिछले तीन वर्षों से प्रशिक्षण ले रही है, अपनी ताकत और सहनशक्ति में सुधार करने पर ध्यान केंद्रित कर रही है. अस्मिता ने अपने प्रशिक्षण के हिस्से के रूप में 6000 मीटर और 7000 मीटर की विभिन्न चोटियों पर चढ़ाई की है और लंबी दूरी के लिए साइकिल चलाना और दौड़ना भी किया है.
उन्होंने उत्तरकाशी में टीएसएएफ बेस कैंप और जमशेदपुर में दलमा हिल्स में भी काफी ट्रेल रनिंग की है. टीएसएएफ में अन्य एवरेस्टरों के अनुभवों और सीखों ने उनकी तैयारियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.


