
उदित वाणी, बोकारो: झारखंड की सांस्कृतिक सुगंध को देश-दुनिया में फैलाने वाले चंदनकियारी के माटी पुत्र और प्रतिष्ठित छऊ नर्तक परीक्षित महतो आज एक दोराहे पर खड़े हैं। एक ओर उन्हें देश का सर्वोच्च ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ मिला है, तो दूसरी ओर वे आज भी घोर आर्थिक तंगहाली और सरकारी उपेक्षा का दंश झेल रहे हैं।

कला के प्रति अटूट निष्ठा और संघर्षमय जीवन
वर्ष 1966 में एक साधारण कुड़मी कृषक परिवार में जन्मे परीक्षित महतो का सफर प्रेरणा से भरा है। मात्र 17-18 वर्ष की आयु में, 1983 में उन्होंने स्थानीय युवाओं को जोड़कर अपनी छऊ मंडली का गठन किया। महान उस्ताद धनंजय महतो और गंभीर सिंह मुण्डा से कला की बारीकियां सीखने वाले परीक्षित ने बीते चार दशकों से इस विधा को अपनी आजीविका और साधना का आधार बनाया है।
उपलब्धियां जो बढ़ाती हैं मान
राष्ट्रीय सम्मान: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से नवाजे गए।
प्रमुख भूमिकाएं: गणेश वन्दना, महिषासुर वध, बिरसा मुण्डा, अभिमन्यु, किरात अर्जुन जैसे पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंगों में अद्भुत अभिनय।
सांस्कृतिक योगदान: ‘घोषाल कृषि मंगल छऊ नृत्य समिति’ की स्थापना और ‘राष्ट्रीय छऊ नृत्य प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र’ में नई पीढ़ी को प्रशिक्षण।
विविध सम्मान: 1991 में बेस्ट उस्ताद पुरस्कार, 1995 में दूरदर्शन पुरस्कार, और चंदनकियारी महोत्सव सम्मान।
सरकारी उदासीनता और कलाकारों का दर्द
पुरस्कारों की चमक के पीछे परीक्षित महतो की व्यक्तिगत जिंदगी संघर्षों से भरी है। उन्होंने कर्ज लेकर अपनी कला को राष्ट्रीय पटल तक पहुँचाया है। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:
भवन की आवश्यकता: वाद्ययंत्रों और छऊ मुखौटों को सुरक्षित रखने के लिए एक अदद भवन।
कायाकल्प: दिल्ली के राजपथ पर प्रदर्शन के बाद भी बकाया राशि का भुगतान अब तक नहीं हुआ है।
सरकारी सहायता: प्रशासनिक स्तर पर ऐसे कलाकारों को आर्थिक संबल और सहयोग की तत्काल आवश्यकता है।
कलाकार को उनका हक?
एक ओर जहाँ परीक्षित महतो अपनी कला के माध्यम से युवा पीढ़ी को पारंपरिक जड़ों से जोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनका जीवन आर्थिक तंगहाली में बीत रहा है। झारखंड सरकार और बोकारो जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि लोक कला और कलाकार की उपेक्षा न हो।

