उदित वाणी, जमशेदपुर : जमशेदपुर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘हुलास’ द्वारा रविवार, दिनांक 17 मई 2026 को कदमा में प्रातःकालीन सत्र में एक गरिमामय “कवि-सम्मेलन” का आयोजन किया गया. मई महीने की इस तपती एवं उमस भरी गर्मी के बीच आयोजित इस साहित्यिक समारोह ने शब्दों की संवेदना और काव्य की शीतलता से उपस्थित प्रबुद्ध जनों को पूरी तरह से भाव-विभोर कर दिया.
माँ सरस्वती की वंदना से आगाज, वरिष्ठ साहित्यकार श्यामल सुमन ने की अध्यक्षता
साहित्यिक कार्यक्रम का भव्य शुभारंभ परंपरा के अनुसार माँ सरस्वती की वंदना से हुआ, जिसकी बेहद भावपूर्ण प्रस्तुति विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’ द्वारा दी गई. इसके पश्चात संस्था का संक्षिप्त परिचय पूर्व अध्यक्ष धनपत चावला ने प्रस्तुत किया. इस गौरवशाली सम्मेलन की अध्यक्षता शहर के वरिष्ठ साहित्यकार श्यामल सुमन ने की.
इस साहित्यिक मंच पर मुख्य रूप से उपस्थित कवि हरिकिशन चावला, श्यामल सुमन, विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’, दीपक वर्मा ‘दीप’, जय प्रकाश पाण्डेय, धनपत चावला तथा अजय मुस्कान ने अपनी प्रभावशाली रचनाओं का उत्कृष्ट काव्य-पाठ कर उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. पूरे कार्यक्रम के दौरान हास्य, व्यंग्य, मानवीय संवेदना, दार्शनिक भाव और सामाजिक सरोकारों के विविध रंग देखने को मिले.
वर्तमान सामाजिक रिश्तों पर अजय मुस्कान का तीखा व्यंग्य
कवि अजय मुस्कान ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक रिश्तों में घर कर रही संवेदनहीनता को बेहद मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया: “अब कौन किसे देख मुस्कुराता है, देखे..! मुझे देख कौन मुस्कुराता है!!”
स्मृतियों की गहराई में ले गए जय प्रकाश पाण्डेय
कार्यक्रम का सफल संचालन कर रहे कवि जय प्रकाश पाण्डेय ने अपनी भावपूर्ण पंक्तियों के माध्यम से मानवीय स्मृतियों और संवेदनाओं की गहराई को सुंदर स्वर दिया: “मेरी वो मधुर व्यथाएँ, मन भूल गया है जिनको, हैं आज कसकती उर में, बेचैन कर रही मुझको.”
दीपक वर्मा ‘दीप’ के हास्य-व्यंग्य से गूंजा हॉल
वहीं, जाने-माने रचनाकार दीपक वर्मा ‘दीप’ ने अपने विशिष्ट हास्य-व्यंग्य (Hasya Kavi) के तीखे बाणों से पूरे वातावरण को हल्का, जीवंत और आनंदमय बना दिया: “मेरे घर के सामने है, एक बरगद का पेड़, जब बीवी नहीं सुनती मेरी रचनाएँ, तो मैं उसे सुना आता हूँ अपने गीत, ग़ज़ल और शेर.”
जीवन के संघर्ष को बयां कर गए विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’
कवि विजय नारायण सिंह ‘बेरुका’ की पंक्तियों ने जीवन संघर्ष की गहरी पीड़ा और मनुष्य की सकारात्मक जिजीविषा को अत्यंत सहजता से श्रोताओं के सामने प्रस्तुत किया:
“जिन्दगी के ग़म सभी सहते रहे, रो नहीं सकते थे, तो हँसते रहे.”
सामाजिक यथार्थ पर पूर्व अध्यक्ष धनपत चावला का प्रहार
हुलास के पूर्व अध्यक्ष धनपत चावला ने आज के सामाजिक और राजनैतिक यथार्थ पर तीखा प्रहार करते हुए ‘गोएबल्स तकनीक’ का उल्लेख किया. उनकी इन पंक्तियों ने उपस्थित बुद्धिजीवियों को गहन चिंतन के लिए प्रेरित किया:
“हद से गुजर जाता है जब कोई ‘झूठ’, नाकाम हो जाती है ‘गोएबल्स तकनीक’. ‘झूठ’ को ‘सच’ में नहीं बदल पाती है, चाहे लाखों बार दोहराया जाए वो झूठ.”
कविता मनुष्य की संवेदनाओं को जीवित रखने का सबसे सशक्त माध्यम: श्यामल सुमन
अपने अध्यक्षीय संबोधन में वरिष्ठ साहित्यकार श्यामल सुमन ने साहित्य को समाज का दर्पण और समाज की आत्मा बताते हुए कहा कि कविता ही मनुष्य की संवेदनाओं को जीवित रखने का सबसे सशक्त माध्यम है. उनकी प्रस्तुत पंक्तियों ने श्रोताओं के मन में गहरा दार्शनिक भाव जगा दिया:
“हो पूनम का चाँद या, जीवन में हो प्यार, पूर्ण हुआ घटने लगा, ऐसा क्यों करतार??”
इस सफल काव्य गोष्ठी का धन्यवाद ज्ञापन अंत में कवि दीपक वर्मा ‘दीप’ द्वारा अत्यंत आत्मीयता से प्रस्तुत किया गया. कार्यक्रम में उपस्थित जमशेदपुर शहर के तमाम साहित्य-प्रेमियों एवं सुधी श्रोताओं की गरिमामयी उपस्थिति ने पूरे आयोजन को अत्यंत सफल, आत्मीय एवं यादगार बना दिया.


