
उदित वाणी, जमशेदपुर : कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) ने शुक्रवार 17 अप्रैल को जमशेदपुर में औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन पर केंद्रित कार्यशाला का आयोजन किया. कार्यशाला में जलवायु कार्रवाई और कार्बन प्रबंधन को व्यवसायों के लिए बढ़ती भूमिका पर जोर दिया गया. यह कार्यशाला विभिन्न क्षेत्रों के उद्योग नेताओं और विशेषज्ञों को एक मंच पर लाई, जहां विकसित हो रहे नियामक आवश्यकताओं, वैश्विक सप्लाई चेन दबावों और बदलती बाजार अपेक्षाओं पर विस्तृत चर्चा हुई. इन कारकों के कारण ग्रीनहाउस गैस (जीएचजी) लेखांकन और डीकार्बोनाइजेशन रणनीतियां अब व्यवसाय की निरंतरता और दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए अत्यंत आवश्यक हो गई हैं. सत्र में जलवायु परिवर्तन को वैश्विक तथा भारतीय परिप्रेक्ष्य से समझाया गया.

औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन अब व्यावसायिक जरूरत
सीआईआई झारखंड सस्टेनेबिलिटी पैनल के कन्वीनर और टाटा स्टील लिमिटेड के चीफ कॉर्पोरेट सस्टेनेबिलिटी सौरभ कुंडु ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन अब व्यावसायिक जरूरत बन चुकी है. उन्होंने बताया कि सस्टेनेबिलिटी अब निवेश निर्णयों, साझेदारियों और बाजार पहुंच को प्रभावित करने वाला निर्णायक कारक बन गया है.
2070 तक नेट जीरो लक्ष्य
भारत के 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य का जिक्र करते हुए कुंडु ने उद्योगों और मूल्य श्रृंखलाओं में समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया. उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों में इरादे मजबूत हैं, लेकिन अब ध्यान व्यावहारिक और स्केलेबल समाधानों के क्रियान्वयन पर केंद्रित करना होगा. झारखंड के औद्योगिक परिदृश्य का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जहां कोयला और ऊर्जा-गहन उद्योग प्रमुख भूमिका निभाते हैं, वहां लो कार्बन ट्रांजिशन, संतुलित और समावेशी होना चाहिए, जिसमें आर्थिक और सामाजिक पहलुओं का पूरा ध्यान रखा जाए. सस्टेनेबिलिटी अब कोर बिजनेस स्ट्रैटजी का अभिन्न अंग बन रही है, जो नवाचार, दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ावा दे रही है.
ग्रीन हाउस गैस की एकाउंटिंग पर जोर
कार्यशाला का तकनीकी सत्र सीआईआई–ग्रीन बिजनेस सेंटर की सीनियर काउंसलर शशिकला अग्रवाल ने संचालित किया. उन्होंने स्कोप-1, स्कोप-2 और स्कोप-3 उत्सर्जन के अंतर्गत ग्रीन हाउस गैस लेखांकन के प्रमुख पहलुओं पर प्रकाश डाला. साथ ही उन्होंने कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म और भारत के कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम जैसे उभरते नियामक ढांचों पर महत्वपूर्ण जानकारी दी. श्रीमती अग्रवाल ने व्यावहारिक डीकार्बोनाइजेशन उपायों और केस स्टडी आधारित नेट-जीरो रोडमैप विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जो संगठनों को उत्सर्जन कम करने और कम-कार्बन संचालन की ओर संक्रमण के लिए ठोस रास्ते प्रदान करते हैं.
घर से शुरू होती है सस्टेनेबिलिटी
सीआईआई झारखंड स्टेट काउंसिल के पूर्व चेयरमैन और एम्डेट जमशेदपुर प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर रंजोत सिंह ने प्रतिभागियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा कि सस्टेनेबिलिटी घर से शुरू होती है और इसे संगठनात्मक प्रथाओं में समाहित करना चाहिए, ताकि दीर्घकालिक लचीलापन और जिम्मेदार विकास सुनिश्चित हो सके. उन्होंने कंपनियों से व्यावहारिक और मापनीय सस्टेनेबिलिटी पहल अपनाने का आग्रह किया. साथ ही सक्रिय भागीदारी के लिए प्रतिभागियों की सराहना की और उन्हें अपने संगठनों में सतत प्रथाओं का नेतृत्व करने के लिए प्रेरित किया. यह कार्यशाला ज्ञान साझा करने और क्षमता निर्माण का महत्वपूर्ण मंच साबित हुई. इसमें प्रतिभागियों को डेटा-आधारित और क्रियान्वयन योग्य जलवायु रणनीतियां तैयार करने के लिए आवश्यक उपकरण और अंतर्दृष्टि प्रदान की गई. सीआईआई, ऐसी पहलों के माध्यम से उद्योगों को निरंतर समर्थन देता रहेगा, ताकि वे सस्टेनेबिलिटी चुनौतियों से आगे रहें और कम-कार्बन तथा लचीले व्यवसाय मॉडल की ओर सफलतापूर्वक ट्रांजिशन कर सकें.

