
उदित वाणी, जमशेदपुर : नहाय खाय के साथ चार दिन तक चलने वाला छठ का महापर्व शनिवार को शुरू हो गया. इस त्योहार का नजारा बाजार में भी दिखने लगा है. जमशेदपुर के विभिन्न घाटों की सफाई अंतिम दौर में है और लोग इस पर्व के उत्साह में सराबोर होने लगे है. छठ पर्व, जो मुख्य रूप से बिहार, पूर्वोत्तर उत्तर प्रदेश, और झारखंड में मनाया जाता है. यह एक एक प्राचीन और आध्यात्मिक त्योहार है, जो सूर्य देव और छठी मइया की पूजा पर केंद्रित है. इसे पर्यावरण का पर्व कहा जाता है क्योंकि यह प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव दर्शाता है. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इस पर्व की महत्ता निम्नलिखित कारणों से और भी बढ़ जाती है:
1. प्रकृति के प्रति सम्मान: छठ पूजा में नदियों, तालाबों और जलाशयों में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है. यह जल स्रोतों के संरक्षण और स्वच्छता के महत्व को रेखांकित करता है. जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट और प्रदूषण बढ़ रहे हैं, ऐसे में यह पर्व जल संरक्षण और पर्यावरण स्वच्छता का संदेश देता है.
2. न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव: छठ पूजा में उपयोग होने वाली सामग्रियां, जैसे बांस, मिट्टी के दीपक, फल, और ठेकुआ, पूरी तरह प्राकृतिक और बायोडिग्रेडेबल होती हैं. यह त्योहार पर्यावरण पर न्यूनतम नकारात्मक प्रभाव डालता है, जो आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में एक आदर्श उदाहरण है.
3. सूर्य ऊर्जा का महत्व: सूर्य की पूजा इस पर्व का केंद्र है, जो नवीकरणीय ऊर्जा के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सौर ऊर्जा जैसे स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना जरूरी है और छठ पूजा इस दिशा में प्रेरणा देता है.
4. सामुदायिक एकजुटता और जागरूकता: छठ पूजा सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देता है. लोग नदियों और तालाबों के किनारे एकत्र होते हैं, जिससे पर्यावरण संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की भावना जागृत होती है. यह सामुदायिक जागरूकता जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण हो सकती है.
5. आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संतुलन: छठ पूजा में उपवास, संयम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है. यह लोगों को प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक हो सकता है.
क्या है इस पर्व का संदेश
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में छठ पर्व न केवल पर्यावरण के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना को मजबूत करता है, बल्कि टिकाऊ जीवनशैली और सामुदायिक जिम्मेदारी को भी प्रोत्साहित करता है. यह हमें सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखना न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, बल्कि भविष्य के लिए भी अनिवार्य है.

