
उदित वाणी, जमशेदपुर : अर्का जैन विश्वविद्यालय, गम्हारिया के प्रांगण में मंगलवार को “त्रिधारा – छऊ नृत्य उत्सव” का भव्य एवं सफल आयोजन किया गया. यह उत्सव झारखंड की अमूल्य अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर छऊ नृत्य की तीन प्रमुख शैलियों—सराइकेला, खरसावां और मानभूम—का अनूठा संगम बनकर उभरा. कार्यक्रम में प्रसिद्ध गुरुओं, कलाकारों, सांस्कृतिक कर्मियों और विद्यार्थियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही.
छऊ की विविध धाराओं का साझा मंच
उत्सव का उद्देश्य छऊ नर्तकों एवं संगीतकारों को एक साझा मंच उपलब्ध कराना, आपसी सीख को प्रोत्साहित करना तथा छऊ नृत्य की सभी शैलियों को समान महत्व के साथ प्रस्तुत करना रहा. “त्रिधारा” के माध्यम से छऊ नृत्य की विविधता, सौंदर्य और समृद्ध परंपरा को जनसामान्य तक पहुँचाने का सशक्त प्रयास किया गया.
उद्घाटन एवं विशिष्ट अतिथि
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 11:00 बजे प्रो. डॉ. एस. एस. राजी, अध्यक्ष, बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट, अर्का जैन विश्वविद्यालय; बी. एन. सारंगी, वरिष्ठ उपाध्यक्ष एवं कार्यकारिणी सदस्य, कलामंदिर; तथा अमितावा घोष, अध्यक्ष, कलामंदिर – द सेलुलॉइड चैप्टर आर्ट फाउंडेशन (CCAF) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया.
कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण पद्मश्री शशधर आचार्य रहे, जो छऊ नृत्य परंपरा के सातवें पद्मश्री सम्मानित गुरु हैं. इस अवसर पर उन्हें सम्मानित किया गया. अपने संबोधन में उन्होंने छऊ नृत्य की तीनों शैलियों, उनकी साधना परंपरा, वैश्विक पहचान तथा नए झारखंड के निर्माण में लोक कलाओं की भूमिका पर अपने विचार साझा किए.
बी. एन. सारंगी ने कलामंदिर की उस परिकल्पना को रेखांकित किया, जिसमें झारखंड की लोक परंपराओं को केवल विरासत नहीं, बल्कि समुदाय आधारित, युवा-केंद्रित और विकास से जुड़ी जीवंत परंपराओं के रूप में देखा जाता है.

सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ : तीन धाराएँ, एक आत्मा
उत्सव के अंतर्गत छऊ नृत्य की तीनों प्रमुख शैलियों की सशक्त प्रस्तुतियाँ हुईं. खरसावां छऊ के अंतर्गत गुरु परमानन्द नन्द एवं दल द्वारा प्रस्तुत शिकारी नृत्य में बिना मुखौटे भाव-भंगिमा और सशक्त शारीरिक अभिव्यक्ति के माध्यम से कथानक उभरा.
सराइकेला छऊ में आचार्य छऊ नृत्य विचित्रा की सुकन्या आचार्य द्वारा प्रस्तुत राधा-कृष्ण एवं मयूर नृत्य में शास्त्रीय सौंदर्य और लोक संवेदना का अद्भुत समन्वय देखने को मिला.
मानभूम छऊ में गुरु गंभीर कुमार महतो एवं दल द्वारा प्रस्तुत युद्ध-प्रधान छऊ में भारी मुखौटे, रंगीन वेशभूषा और वीर रस की प्रधानता रही.
इन प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि छऊ नृत्य मानव जीवन, प्रकृति, पौराणिक कथाओं और सामाजिक मूल्यों का सजीव चित्रण है तथा मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य का प्रतीक भी है.

आभार एवं समन्वय
कार्यक्रम का समापन फाल्गुनी रॉय, कार्यकारिणी सदस्य, कलामंदिर द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ. कार्यक्रम का सफल समन्वय देवला मुर्मू ने किया, जबकि शैक्षणिक समन्वय में संजु महतो एवं गीता सोरेन का विशेष योगदान रहा.
“त्रिधारा – छऊ नृत्य उत्सव” एक सार्थक सांस्कृतिक पहल के रूप में सामने आया, जिसने परंपरा और वर्तमान के बीच सेतु बनाते हुए छऊ नृत्य को झारखंड की जीवंत, सशक्त और निरंतर विकसित होती सांस्कृतिक पहचान के रूप में स्थापित किया.
आगे की पहल
उत्सव के विस्तार के रूप में 7 जनवरी 2026 को प्रातः 9:00 बजे अर्का जैन विश्वविद्यालय परिसर में पारंपरिक छऊ मुखौटा निर्माण कार्यशाला आयोजित की जाएगी. इस कार्यशाला का संचालन गुरु सुशांत महापात्र (सराइकेला) करेंगे. कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों और युवा कलाकारों को छऊ मुखौटों की कला, प्रतीकात्मकता और शिल्प परंपरा से परिचित कराना है.

