
उदित वाणी, रांची : झारखंड हाईकोर्ट में बुधवार को नगर निकायों के चुनाव में मेयर एवं नगर परिषद अध्यक्ष के पदों के आरक्षण रोस्टर के निर्धारण के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई हुई. मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने दलील दी कि पदों का आरक्षण संविधान के निर्धारित क्रम [रोस्टर] के अनुसार नहीं किया गया है. जो अनुचित है. वहीं अदालत ने मामले में राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग से जबाब दाखिल करने का निर्देश दिया. साथ ही मामले में अगली सुनवाई की तिथि 29 जनवरी निर्धारित की गई.
यह याचिका राज्य स्तर पर रोस्टर की वैधता पर केंद्रित है. जहां जनसंख्या आधारित संतुलन न होने का आरोप प्रमुख रूप से लगाया गया है. सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग से पूछा कि इस तरह से सीटों को क्यों आरक्षित किया गया है. इससे संबंधित जबाब शपथ पत्र के माध्यम से अदालत के समक्ष प्रस्तुत करें. अदालत ने चक्रधरपुर में निर्धारित आरक्षण के खिलाफ पूजा गिरि की ओर से दाखिल याचिका को भी इस मामले के साथ टैग कर दिया.
जिसमें एसटी के लिए पद आरक्षित करने मुद्दा उठाया गया है. बताया गया है कि उस क्षेत्र में मात्र आठ प्रतिशत एसटी की जनसंख्या है. ऐसे में एसटी के लिए पद आरक्षित करना उचित नहीं है. दोनों मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी को होगी. याचिकाकर्ता उपेंद्र कुमार और अन्य की ओर से अधिवक्ता अभय कुमार मिश्रा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने शहरी निकाय चुनाव में आरक्षण के लिए नई नियमावली बनाई है.
लेकिन इसमें संविधान के प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है. उनकी ओर से कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 243 यटीद्ध के तहत निर्धारित रोस्टर में सबसे पहले अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और उसके बाद महिला के लिए पद आरक्षित किया जाना है. लेकिन सरकार की ओर से जारी आरक्षण रोस्टर में अनुसूचित जनजाति को पहले रखा गया है. ऐसा करना संविधान का उल्लंघन है. वहीं राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से कहा गया कि सरकार का निर्णय उचित है.
जनसंख्या के आधार पर आरक्षण के लिए रोस्टर तय किया गया है. सरकार को ऐसा करने का अधिकार भी है. इस पर प्रार्थी की ओर से कहा गया कि रोस्टर का रोटेशन संवैधानिक परिधि में किया जाना चाहिए न कि मनमाने तरीके से. इसको लेकर संविधान में स्पष्ट प्रावधान किया गया है. ज्ञात हो कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा 9 जनवरी 2026 को शहरी निकायों के लिए आरक्षण सूची जारी की गई है. जिसके बाद कई निकायों में आरक्षण को लेकर असंतोष व्यक्त किया गया है. मुख्य रूप से आरक्षण रोस्टर की वैधता और जनसंख्या आधारित आवंटन पर केंद्रित है.

