
उदित वाणी, रांची : रिम्स के बाद अब झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने केंद्रीय मनोरोग संस्थान [सीआईपी] कांके की 147 एकड़ भूमि से अतिक्रमण हटाने के मामले में राज्य और केंद्र सरकार से जबाब तलब किया है. हाईकोर्ट ने मामले में सरकार से चार सप्ताह में जबाब दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले में अगली सुनवाई 27 जनवरी 2026 को होगी. अदालत ने 19 नवंबर 2025 को दिए गए आदेश का हवाला देते हुए बताया कि सीआईपी रांची की भूमि पर अतिक्रमण हटाने के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई थी.
इस समिति को दो सप्ताह के भीतर भूमि का सीमांकन कर अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया गया था. अदालत के समक्ष भूमि सुधार उप समाहर्ता के शपथपत्र से यह तथ्य सामने आया है कि सीआईपी के वास्तविक कब्जे में मात्र 229.29 एकड़ भूमि ही पाई गई. जबकि सीआईपी के अनुसार उसकी कुल भूमि 376.222 एकड़ [1570 बीघा, 37 कट्ठा, 26 छटांक] है. लगभग 147 एकड़ भूमि का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं दिया गया यानी करीब 147 एकड़ पर अतिक्रमित है.
हाईकोर्ट ने सीआईपी की जमीन पर अतिक्रमण हटाने के मामले में राज्य व केंद्र सरकार के अधिकारियों की निष्क्रियता पर कड़ी भी टिप्पणी की है. खंडपीठ ने कहा कि यह बेहद चौंकाने वाला है कि सरकारी संपत्तियों के संरक्षक माने जाने वाले अधिकारी गहरी नींद में थे और उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की पहल पर जागना पड़ा जो बिहार राज्य का निवासी है. ज्ञात हो कि मामले में याचिकाकर्ता बिहार निवासी विकास चंद्रा उर्फ गुड्डू बाबा ने जनहित याचिका दायर की है. अदालत ने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि शपथ पत्र में केवल सीआईपी के गेट पर अतिक्रमण हटाने की बात कही गई है.
जबकि अन्य अतिक्रमणों के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई. निरीक्षण के समय सीआईपी का प्रतिनिधि मौजूद था. लेकिन वह कथित अतिक्रमण के सटीक स्थान नहीं दिखा पाया. बाद में रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करते समय उसने अतिक्रमण होने की बात तो कही, परंतु स्थान का उल्लेख नहीं किया. खंडपीठ ने कहा कि यह रवैया अदालत के आदेशों के प्रति गंभीर लापरवाही को दर्शाता है. वही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि कोई अन्य अदालत या प्राधिकरण इस मामले की सुनवाई नहीं करेगा.

