
उदित वाणी, जमशेदपुर: जमशेदपुर पुस्तक मेला का क्रेज कम हो रहा है. कभी शहर के पुस्तक प्रेमियों का केन्द्र रहने वाला पुस्तक मेला अब उदास और उजाड़ दिखता है.
भले ही आयोजक कह रहे हैं कि कोरोना के पहले के मुकाबले इस साल का रिस्पांस बेहतर है लेकिन शाम को मेले में आने वाले विजिटर्स कुछ और ही कहानी कहते हैं. अधिकतर प्रकाशकों का कहना है कि इस साल मेला बेहद डल है और खरीदारी भी कम हो रही है. वीक एंड में पहले काफी लोग आते थे, वह भी नहीं आ रहे हैं.
एक प्रकाशक ने तो नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि स्टॉल को लेने में जो खर्च आया है, उसे निकाल पाना भी मुश्किल है.
अब संस्थागत खरीदारी कम होती है
काफी समय तक टाटा स्टील, जमशेदपुर पुस्तक मेले का सबसे बड़ा खरीदार था. वह मेले के कुल बिजनेस का 30 से 40 फीसदी खरीदारी अकेले करता था.
साथ ही उस समय शहर के स्कूल-कॉलेजों के साथ ही बड़ी संस्थाएं भी पुस्तकों की खरीदारी करती थी. टैगोर सोसायटी के अनुसार उस समय मेले में 60 से 70 फीसदी संस्थागत खरीदारी होती थी. संस्थागत खरीदारी एक तरह से इस मेले का बैकबोन थी, जो 2010 के बाद कमजोर पड़ गयी. जमशेदपुर में व्यक्तिगत खरीदारी कभी भी 30 फीसदी से ज्यादा नहीं रही.
अब जब संस्थागत खरीदारी ना के बराबर हो गई है तो पूरा मेला व्यक्तिगत खरीदारी पर टिक गया है. एक समय तक मेले में एक करोड़ रूपए के पुस्तकों का कारोबार होता था, जो अब 30 लाख तक पर सिमट गया है.
यही नहीं दस दिन तक मेले में 70 से 80 हजार विजिटर्स आते थे, जो अब 30 हजार रह गये हैं. इससे साफ है कि जमशेदपुर में व्यक्तिगत खरीदारी न तो पहले बहुत होती थी और न ही आज होती है.
जानिए क्या है और वजह
तो क्या तकनीक का मेले पर है प्रभाव- तो क्या तकनीक के चलते मेला में पुस्तक प्रेमी कम आ रहे हैं? शहर के मशहूर लेखक और साहित्यकार जयनंदन कहते हैं-तकनीक का प्रभाव केवल जमशेदपुर में ही है? दिल्ली, कोलकाता और पटना में आज भी पुस्तक मेला में विजिटर्स खूब आते हैं.
बकौल जयनंदन, जमशेदपुर पुस्तक मेला केवल खरीद फरोख्त का केन्द्र बन गया है. यहां पर कोई साहित्यिक गतिविधियां नहीं होती. दिल्ली और पटना में हर रोज साहित्यक गोष्ठी, सेमिनार और विमोचन के कार्यक्रम होते रहते हैं, जिसमें बड़े लेखक रहते हैं. यहां पर एक गोष्ठी होती भी है तो ले देकर हर साल वहीं चेहरे होते हैं.
हिन्दी प्रकाशकों की संख्या कम-मेले में हिन्दी प्रकाशकों की संख्या कम होती है. हर साल वहीं दो चार स्टॉल होते हैं. वे भी खाली रहते हैं और कहते हैं कि पुस्तकें बिक नहीं रही. हिन्दी के प्रकाशक और होने चाहिए और प्रतिष्ठित प्रकाशकों को बुलाना चाहिए.
लेखन को कुछ लोग फैशन समझ लिए हैं-जयनंदन ने बताया कि स्थानीय लेखकों की भी स्तरीय पुस्तकें नहीं है. अधिकतर लेखन को फैशन समझ लिए हैं. लेखक कहलाने के लिए कहीं से भी सौ प्रति छपवाली.
इनकी किताबें बिकती नहीं. मेले में लगाते हैं. आखिर क्यों इनकी किताबें कोई खरीदेगा? साहित्य साधना है, साहित्यकार सर्जक होता है. ऐसी किताबों बकवास है और केवल दिखाने के लिए लिखी जाती है. ऐसे स्वयंभू लेखकों की बाढ़ आ गई है.
औद्योगिक शहर का साहित्यिक मिजाज कम होता है-जयनंदन बताते हैं कि शिफ्ट में नौकरी करने वाले इस औद्योगिक शहर के लोगों में साहित्यिक रूझान बहुत कम है.
इसके चलते उनके बच्चों में भी साहित्य बोध या पुस्तकों का संस्कार नहीं होता. पैसा कमाने पर मोबाइल खरीद कर बच्चों को देने वाले लोगों से आप पुस्तकें खरीदनें की उम्मीद नहीं कर सकते. जो व्यवसायी वर्ग है, उसे पैसे बनाने से फूर्सत नहीं है.


