
उदित वाणी, जमशेदपुर: करीम सिटी कॉलेज के मास कम्युनिकेशन विभाग के तत्वावधान में शनिवार को कॉलेज प्रेक्षागृह में रेडियो पर तीन दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई.
रेडियो प्रसारण के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित इस संगोष्ठी का जिस का विषय है -रेडियो की दुनिया पर पुर्नदृष्टि. सीनियर ब्रॉडकास्ट जर्नलिस्ट स्नेहाशीष सूर ने भारत में रेडियो प्रसारण के प्रारंभिक दिन की चर्चा की. उन्होंने भारत में रेडियो की प्रारंभिक स्थिति और सामाजिक स्तर पर उसके प्रति लोगों के रुझान को प्रस्तुत किया.
चिनमय महतो का विषय था- ये मेरा दीवानापन है. उन्होंने मनुष्य के जीवन में रेडियो के महत्व और उसके लिए दीवानगी की हद को बड़े रोचक अंदाज में पेश किया.
इस अवसर पर वरिष्ठ उदघोषक शाहिद अनवर ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के द्वारा अपनी प्रस्तुति दी जिसका विषय था- “रेडियो: आवाज का सफर”. उन्होंने रेडियो द्वारा आवाज के सफर को पेश करते हुए बताया कि आज से ठीक 100 साल पहले जून 1923 में पहली बार मुंबई में रेडियो क्लब ने इसकी शुरुआत की.
उसके 5 महीने बाद कोलकाता से रेडियो का प्रसारण शुरू हुआ. उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी ने पहली बार स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 11 नवंबर 1947 को रेडियो के माध्यम से अपनी बात रखी थी.
इसके पहले कॉलेज प्राचार्य डॉ मोहम्मद रेयाज ने स्वागत भाषण दिया. डॉ नेहा तिवारी (प्रोफेसर इंचार्ज मास कम्युनिकेशन विभाग करीम सिटी कॉलेज) ने कन्वेनर के रूप में अपनी बात रखी तथा संगोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला.
धन्यवाद ज्ञापन डॉ रश्मि कुमारी ने किया. रेडियो के भाषा संस्कार को बताया अनुपम पाठक ने विशेष सत्र में विविध भारती राष्ट्रीय प्रसारण की सहायक निदेशक ( कार्यक्रम) रेणु चतुर्वेदी ने मुंबई से जुड़कर संकटकाल में विविध भारती के कार्यक्रमों की भूमिका पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि कैसे कोविड-19 विविध भारती के श्रोताओं के लिए मनोरंजन और ज्ञान दोनों का माध्यम बना.
इसके उपरांत अंतरराष्ट्रीय ख्याति ब्रॉडकास्टर अनुपम पाठक ने आकाशवाणी के माध्यम से भाषा के संस्कार और शुद्ध उच्चारण पर जोर दिया. पाठक ने कहा कि रेडियो की भाषा परिष्कृत होने की वजह से भाषा सीखने का एक अच्छा माध्यम बन सकती है.
इस विषय को अनुपम पाठक ने उदाहरण देकर समझाया. इसके बाद अर्जेंटीना से जुड़े प्रोफेसर व कम्युनिकेटर डॉ सरजिओ रिकार्डो ने अर्जेंटीना में अभी भी रेडियो प्रसारण में एएम की भूमिका और उपयोगिता पर प्रकाश डाला. मोरक्को के एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत डॉ मार्टिन गैंगसिंगर फ्रॉम ने रेडियो में लोकप्रिय संगीत के अलावा क्लासिकल संगीत को शामिल करने की जरूरत पर बल दिया.
तकनीक सत्र में 13 शोध पढ़े गए
दोपहर बाद कम से कम 13 शोध पत्र पढ़े गए, जिनमें आर्का जैन विश्वविद्यालय, नेताजी सुभाष चंद्र विश्वविद्यालय,महिला विश्वविद्यालय, सेंट जेवियर कॉलेज, कोल्हान व रांची तथा अन्य स्थानों से आए विद्वानों ने अपने शोध पत्र पढ़े. इनके अलावा कई शोधार्थियों ने विदेशों से जुड़कर अपने शोध ऑनलाइन पेश किए.
इस अवसर पर डॉ शालिनी प्रसाद, डॉ श्याम कुमार, सुमित कुमार, डॉ नील कुलसुम कुल्लू, डॉ डॉ सुशीला हांसदा, डॉ मुकुल भृंगराज, डॉ शाहबाज अंसारी, साकेत कुमार, संजय प्रसाद, डॉ इंद्रसेन सिंह, डॉ बीएन त्रिपाठी, डॉ अनवर शहाब, डॉ कौसर तस्लीम, डॉ वसुंधरा राय, डॉ फखरुद्दीन डॉ नज़री के अलावा महाविद्यालय के कई शिक्षक और बाहर से आए हुए लोग भारी संख्या में उपस्थित रहे.
कार्यक्रम को आयोजित करने में सैयद साजिद परवेज, सैयद शाहजेब परवेज, तासीर शाहिद, बापी मुर्मू, तन्मय सोलंकी तथा जावेद का विशेष योगदान रहा.


