
उदित वाणी, जमशेदपुर: दक्षिण पूर्व रेलवे के टाटानगर यार्ड में वर्षों से चली आ रही जलजमाव की समस्या को इस बार जड़ से समाप्त करने के उद्देश्य से रेलवे प्रशासन ने एक व्यापक और बहुस्तरीय योजना बनाई है। इस योजना के तहत यार्ड क्षेत्र में ट्रैक के नीचे बह रही नालियों की सफाई, उनकी मरम्मत और संरचनात्मक पुनर्निर्माण पर काम तेज कर दिया गया है।
टाटानगर रेलवे स्टेशन झारखंड राज्य का प्रमुख रेलवे केंद्र है, जहां से प्रतिदिन सैकड़ों यात्री और मालगाड़ियां गुजरती हैं। यार्ड के माध्यम से ही ट्रेनों का शंटिंग, इंजन चेंज, कोच अटैचमेंट, माल लोडिंग और अनलोडिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्य होते हैं। ऐसे में मानसून के दौरान यदि जलजमाव होता है, तो न केवल परिचालन बाधित होता है, बल्कि सुरक्षा जोखिम भी बढ़ जाता है।
यार्ड की संरचना और ड्रेनेज की जटिलता
टाटानगर यार्ड की संरचना लगभग 80 वर्ष पुरानी है। इसमें अप/डाउन मेन लाइन के अलावा रानी साइड, गोविंदपुर साइड, मालगोदाम यार्ड, डीजल शेड, कोचिंग यार्ड, और पीडब्लूआई साइड यार्ड हैं। यार्ड के इन खंडों में कुल मिलाकर 60 से अधिक ट्रैक लाइनें हैं, जिनके नीचे से छोटी-बड़ी नालियाँ गुजरती हैं। इनमें से अधिकांश नालियाँ मिट्टी, प्लास्टिक, ग्रिट, और तेलीय अवशेष से बंद हो चुकी हैं।
रेलवे इंजीनियरिंग विभाग द्वारा किए गए एक आंतरिक सर्वेक्षण में यह पाया गया कि यार्ड क्षेत्र में कम से कम 12 प्रमुख ड्रेनेज चोक पॉइंट हैं, जहां पानी जमा होकर ट्रैक के ऊपर बहने लगता है। इससे न केवल इलेक्ट्रिकल शॉर्ट सर्किट का खतरा बढ़ता है, बल्कि पटरियों की स्थिरता भी प्रभावित होती है।
पूर्व वर्षों की जलजमाव घटनाएं
पिछले पांच वर्षों के आंकड़े देखें तो हर मानसून में औसतन 6 से 8 दिन ऐसे आते हैं जब टाटानगर यार्ड में जलभराव के कारण ट्रेनें प्रभावित होती हैं। 2022 में भारी बारिश के दौरान यार्ड में एक फीट तक पानी जमा हो गया था, जिससे 9 ट्रेनें कैंसिल, 6 शॉर्ट टर्मिनेट और 4 डायवर्ट करनी पड़ी थीं। यात्रियों को घंटों रेलवे स्टेशन पर फंसे रहना पड़ा था।
रेलवे कर्मचारी संगठनों ने भी कई बार इस मुद्दे को उठाया है कि यार्ड में काम करने वाले सफाईकर्मियों और तकनीकी कर्मचारियों को बरसात के दिनों में घुटनों तक पानी में उतरकर काम करना पड़ता है, जिससे संक्रमण और दुर्घटना की संभावना बनी रहती है।
तकनीकी समाधान : नई ड्रेनेज प्रणाली और उच्च तकनीक मशीनों का प्रयोग
इस बार रेलवे ने केवल नालों की सफाई नहीं, बल्कि उनकी पुनर्संरचना की ओर कदम बढ़ाया है। इंजीनियरिंग विभाग द्वारा निम्नलिखित तकनीकी समाधान अपनाए जा रहे हैं:
1. हाई प्रेशर जेटिंग मशीन का उपयोग किया जा रहा है जोकि जाम पड़ी नालियों में जमा कचरे को पानी के तीव्र प्रवाह से निकालती है।
2. स्लज पंप और सक्शन ट्रक – गंदे पानी और गाद को सीधे चैंबर से निकाल कर डिस्पोजल पिट में स्थानांतरित किया जा रहा है।
3. सीसीटीवी ड्रेनेज कैमरा सर्वे – पहली बार टाटानगर यार्ड में पाइप नालियों की अंदरूनी स्थिति जानने के लिए विशेष कैमरे से निरीक्षण किया गया है। इससे नाली के क्षतिग्रस्त हिस्सों की पहचान आसान हो गई।
4. आरसीसी बॉक्स ड्रेन निर्माण योजना – रेलवे की दीर्घकालिक योजना के तहत ट्रैक के नीचे से बहने वाली प्रमुख नालियों को आरसीसी प्रीकास्ट बॉक्स ड्रेनों से बदला जाएगा, ताकि इनकी सफाई और रखरखाव आसान हो सके।
रेलवे का समयबद्ध लक्ष्य : 5 जुलाई तक सफाई कार्य पूर्ण
रेलवे ने स्पष्ट लक्ष्य तय किया है कि 5 जुलाई से पहले सभी प्रमुख नालियों की सफाई, दोषपूर्ण नालियों की मरम्मत और जल निकासी की वैकल्पिक व्यवस्था पूरी कर ली जाए। इसके लिए टेंडर आधारित एजेंसियों को भी तैनात किया गया है। रेलवे का मानना है कि यदि जुलाई मध्य तक झारखंड में भारी बारिश शुरू होती है, तो उससे पहले तैयारी पूरी होनी चाहिए।
टाटानगर यार्ड से प्रतिदिन 150 से अधिक मालगाड़ियाँ निकलती हैं, जिनमें लौह अयस्क, कोयला, इस्पात, सीमेंट, और औद्योगिक सामग्रियां शामिल होती हैं। जलजमाव के कारण यदि मालगाड़ियों की गति प्रभावित होती है तो इसका सीधा असर टाटा स्टील, जिंदल, एनएमडीसी, और अन्य उद्योगों पर पड़ता है। रेलवे की कोशिश है कि इन औद्योगिक लिंकिंग को भी पूरी तरह संरक्षित रखा जाए।
मानसून से पहले की तैयारी में जुटा रेलवे प्रशासन
रेलवे अधिकारियों का कहना है कि इस बार जल निकासी की पूरी व्यवस्था को दुरुस्त करने की योजना बनाई गई है। इसके तहत टाटानगर यार्ड के प्रत्येक सेक्शन की ड्रेनेज लाइन की मैपिंग की जा रही है और उन स्थानों को चिन्हित किया जा रहा है जहां जलजमाव की स्थिति अधिक बनती है। विशेष फोकस पुराने ट्रैक सेक्शनों पर है, जहां पानी का निकास अत्यंत धीमा है या पूरी तरह बंद हो चुका है।
रेलवे की इंजीनियरिंग विभाग की टीम ने हाल ही में यार्ड का व्यापक निरीक्षण किया, जिसमें जलजमाव के संभावित बिंदुओं को सूचीबद्ध किया गया। इसके बाद हाई प्रेशर जेटिंग मशीन, मैनुअल क्लीनिंग और एक्सकेवेटर मशीन की सहायता से नालियों की सफाई की जा रही है।
जल निकासी में तकनीकी दिक्कतें भी आ रही सामने
रेलवे सूत्रों के अनुसार, यार्ड क्षेत्र के कई हिस्सों में बनी पुरानी नालियों की संरचना आज के मानकों के अनुसार नहीं है। कुछ जगहों पर नालियों के ऊपर भारी ट्रैक्स गुजरते हैं, जिससे सफाई कार्य करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। वहीं कुछ हिस्सों में अतिक्रमण की वजह से भी जल निकासी बाधित हो रही है। इस कारण रेलवे को सटीक समाधान के लिए कई स्तरों पर काम करना पड़ रहा है।
इंजीनियरिंग विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “यह समस्या एक दिन की सफाई से हल नहीं हो सकती। हम इस बार एक स्थायी समाधान की ओर बढ़ रहे हैं। ट्रैक के नीचे नई ड्रेनेज पाइपलाइन बिछाने की योजना है। वहीं, कुछ स्थानों पर आरसीसी कवर के साथ ओपन नाले बनाने पर भी विचार चल रहा है, ताकि समय-समय पर सफाई संभव हो सके।”
बीते वर्षों में बढ़ी जलजमाव की समस्या
पिछले कुछ वर्षों से टाटानगर यार्ड में बारिश के दौरान जलजमाव की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। यार्ड के विभिन्न शंटिंग लाइन, अप-डाउन ट्रैक और मालगोदाम के पास पानी जमा हो जाता है, जिससे ट्रेन संचालन में देरी होती है। पिछले साल जुलाई और अगस्त में कई दिनों तक ट्रेनों को कैंसिल करना पड़ा था। इसका मुख्य कारण नालियों का जाम होना और पानी के निकलने का उचित मार्ग न होना था।
यात्रियों को घंटों प्लेटफॉर्म पर इंतजार करना पड़ा था और कई बार उन्हें बिना यात्रा किए घर लौटना पड़ा। ऐसी स्थिति से बचने के लिए रेलवे प्रशासन ने इस बार जल निकासी की समस्या पर विशेष ध्यान देने का निर्णय लिया है।
जनहित में कार्य को प्राथमिकता : डीआरएम चक्रधरपुर मंडल
चक्रधरपुर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) ने इस अभियान को जनहित से जुड़ा बताते हुए कहा कि, “हमारा उद्देश्य है कि मानसून में भी रेल सेवाएं बिना किसी व्यवधान के सुचारु रूप से संचालित रहें। यात्रियों की सुविधा के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। ड्रेनेज क्लीनिंग का कार्य प्रगति पर है और उम्मीद है कि आगामी भारी बारिश में इस बार जलजमाव जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी।”
रेलवे का लक्ष्य मानसून में बिना बाधा के संचालन
रेलवे प्रशासन का अंतिम उद्देश्य है कि आने वाले दिनों में जब बारिश तेज़ हो, तब भी टाटानगर यार्ड में ट्रेनों का परिचालन सामान्य रूप से जारी रहे। इसके लिए इंजीनियरिंग, मैकेनिकल, ऑपरेशन और हेल्थ विभाग मिलकर काम कर रहे हैं। रेलवे की योजना है कि जुलाई के पहले सप्ताह तक सफाई कार्य पूर्ण कर लिया जाए ताकि मानसून के मुख्य चरण में जलजमाव की कोई स्थिति न बने।

