
उदित वाणी, जमशेदपुर : ऐतिहासिक नागा मंदिर इस वर्ष शताब्दी उत्सव के साथ शारदीय दुर्गा पूजा मनाने जा रहा है. नगर और पूरे झारखंड में आस्था और श्रद्धा का प्रमुख केंद्र माने जाने वाले इस मंदिर की स्थापना 26 जनवरी 1905 को स्व. बाबू नन्द तिवारी और नागा बाबा ने की थी.
मंदिर प्रांगण में मां दुर्गा, काल भैरव, श्री जगन्नाथ महाप्रभु, शीतला माता, दक्षिणमुखी हनुमान, विष्णु-लक्ष्मी, राधा-कृष्ण, पंचमुखी महादेव और सफेद संगमरमर से निर्मित शिवलिंग प्रतिष्ठित हैं. स्थापना काल से ही मंदिर में अखंड धूनी जल रही है, जो इसकी आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक मानी जाती है.
मुख्य आकर्षण और उत्सव
मंदिर का प्रमुख आकर्षण श्री जगन्नाथ रथयात्रा और मेला है. ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ का महा स्नान महोत्सव 108 कलशों के साथ संपन्न होता है. आषाढ़ दूज को तीनों विग्रहों को रथ पर बैठाकर मंदिर की परिक्रमा कराई जाती है और फिर बेलडीह तुलसी मंदिर (मौसीबाड़ी) ले जाया जाता है. आठ दिन बाद वापसी यात्रा होती है.
मंदिर प्रांगण में स्थित प्राचीन वटवृक्ष वट सावित्री व्रत का प्रमुख स्थल है. आंवले के वृक्ष पर अक्षय नवमी को महिलाएं पूजन हेतु पहुंचती हैं. शीतला माता की मूर्ति के प्रति श्रद्धालुओं का मानना है कि जलाभिषेक से चेचक जैसी बीमारियों से मुक्ति मिलती है. यही कारण है कि मुस्लिम और फारसी समुदाय के लोग भी आकर आस्था व्यक्त करते हैं. काल भैरव की पूजा हेतु देशभर से श्रद्धालु आते हैं, और प्रत्येक रविवार विशेष पूजा होती है.
सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियाँ
हर माह तीसरे मंगलवार को मंदिर में भव्य पूजा और आरती आयोजित की जाती है. मंदिर प्रबंधन वृद्धाश्रमों में भोजन एवं वस्त्र वितरण, निशुल्क स्वास्थ्य शिविर, दवा वितरण और शिक्षा सहयोग जैसे सामाजिक कार्य करता है. यहां विवाह संस्कार, रुद्राभिषेक, चंडी पाठ, सुंदरकांड जैसे अनुष्ठान विद्वान पंडितों द्वारा सम्पन्न कराए जाते हैं. इसके साथ ही धर्म, वेद, पुराण और भारतीय संस्कृति पर सेमिनार व संगोष्ठियों का आयोजन भी किया जाता है.
शताब्दी वर्ष पर विशेष कार्यक्रम
1905 से निरंतर जारी शारदीय दुर्गा पूजा की परंपरा इस वर्ष शताब्दी वर्ष के रूप में भव्य रूप से मनाई जाएगी. इस अवसर पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा:
1. 29 सितम्बर, 2025 (सप्तमी) – संध्या 7:30 बजे 100 श्रद्धालुओं द्वारा सामूहिक महाआरती.
2. 100 बार से अधिक रक्तदान करने वाले समाजसेवी का सम्मान.
3. मंदिर की स्मारिका का प्रकाशन.
4. विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम.
5. भोग वितरण.
6. दुर्गा पूजा उपरांत ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल कैंप.
7. दिसंबर माह में जरूरतमंदों के बीच वस्त्र एवं कंबल वितरण.
इस शताब्दी वर्ष के आयोजन को लेकर मंदिर प्रशासन और स्थानीय समाज अत्यधिक उत्साहित है. मंदिर की भव्य परंपरा और सामाजिक कार्य इसे नगर का एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्र बनाते हैं.

