
उदित वाणी, जमशेदपुर: शहर के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में से एक लोयोला स्कूल के प्रिंसिपल फादर पायस फर्नांडिस 31 मार्च को स्कूल में 17 वर्षो तक सेवा देने के बाद रिटायर हो गए.
वे अब धनबाद स्थित डिनॉबली स्कूल में शिक्षकों के प्रशिक्षक व सलाहकार की भूमिका में अपना योगदान देंगे. उन्होंने बताया कि वे जेसूईट सोसाइटी में पिछले 36 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान दे रहे हैं. लोयोला स्कूल के 16 साल तक (दो कार्यकाल में) प्रिंसिपल रहे फादर पायस को शनिवार को स्कूल के बच्चों, शिक्षकों, एल्युमिनाई एसोसिएशन के सदस्यों आौर लोयला परिवार के सदस्यों द्वारा आयोजित भव्य व भावुक विदाई समारोह में हर किसी ने उनके व्यक्तित्व के नायाब पहलुओं को रेखांकित किया.
हर किसी का यही कहना था कि फादर पायस से मिली शिक्षा उन्हें जीवनपथ पर आगे बढऩे में आलोकित करती रही. वे हमेशा याद आते रहेंगे. अपने 17 साल के कार्यकाल में फादर पायस के मार्गदर्शन में हजारों छात्र पढक़र निकले.
वे आज विभिन्न क्षेत्रों और शहरों में सक्रिय हैं. इनमें से कई ऐसे परिवार हैं जिनकी दो पीढिय़ों ने फादर पायस से शिक्षा ग्रहण की. इनसे हजारों अभिभावकों का भी संपर्क रहा. हर किसी पर इनके व्यक्तित्व का असर पड़ा. फादर पायस के जमशेदपुर से अब धनबाद चले जाने की खबर मात्र से जमशेदपुर में उन्हें जानने वााला हर कोई मायूस सा है.
फादर पायस का व्यक्तित्व ही ऐसा रहा कि जो भी उनसे एक बार मिला वह उनका होकर रह गया. लोयला स्कूल के पूर्व और वर्तमान छात्र इस बात को शिद्दत से याद करते हैं कि फादर पायस हर दिन स्कूल खुलने से लेकर छुट्टी तक, गेट से लेकर क्लास रूम तक विजिट करते थे. इस दौरान बच्चों की गतिविधियों से लेकर स्कूल की व्यवस्था तक की छोटी से छोटी कमी पर उनकी नजर रहती थी.
यही उनकी पॉजिटिविटी थी. इन कमियों को वे बहुत करीने से सामने लाते थे. जिससे बच्चे व्यवस्था को यह भान नहीं हो पाता था कि फादर जानबूझकर कमी निकाल रहे हैं बल्कि हर कोई यह समझता था कि फादर अच्छा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.
उनके व्यक्तित्व का यह पहलू उनसे जुड़ा हर कोई न सिर्फ अपने भीतर आत्मसात करने का प्रयास करता है. बल्कि बार-बार बताता है कि फादर का यह गुण उसे जीवन भर याद रहेगा और दूसरों को भी सिखाने के लिए प्रेरित करेगा.
तो आप जमशेदपुर को किस रूप में देखते हैं? प्राचार्य के रूप में कभी न भुलाने वाली घटना क्या रही?
यह सवाल सुनते ही यादों में कुछ खो सा गए फादर पायस. फिर कहा- प्राचार्य के रहते दाखिले के लिए उनसे हजारों लोगों ने संपर्क किया. इतनी ही संख्या में सिफारिश वाले पत्र भी आए.
लेकिन अफसोस इस बात का कि एक भी पैरवीकार ने किसी गरीब या आदिवासी बच्चे के दाखिले के लिए पैरवी नहीं की. उन्होंने सवाल किया क्या ऐसे बच्चों का दाखिला लोयोला स्कूल में नहीं होना चाहिए? एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उनके पास नामांकन के लिए पैरवी करनेवालों में नेता, ब्यूरोक्रेट और समाजसेवियों समेत हर वर्ग के प्रभावी लोग शामिल रहते थे.
फादर पायस ने कहा कि लोयोला स्कूल की खासियत है कि यहां गरीब और अमीर के बच्चों में अंतर नहीं किया जाता है.
किताबी शिक्षा से ज्यादा जरूरी मूल्य आधारित शिक्षा
पठन पाठन की मौजूदा स्थिति पर फादर पायस ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों को किताबी शिक्षा से ज्यादा मूल्य आधारित शिक्षा देने की आवश्यकता है. हमें अपनी नई पीढ़ी को भारतीय सभ्यता संस्कृति, अनुशासन और एक दूसरे के धर्म, जाति को सम्मान देने को प्रेरित करना होगा तभी जाकर हमारा राष्ट्र आगे बढ़ेगा.
फादर पायस कहते हैं कि लोयला स्कूल जमशेदपुर के पूर्व विद्यार्थी आज सोसाइटी के डेवलपमेंट में अपना अहम योगदान दे रहे हैं. इससे हमें काफी संतोष मिलता हैं और साथ ही गर्व की भी अनुभूति होती है कि हमारी शिक्षा आज इस रूप में समाज को मजबूती प्रदान कर रही है. लोयला जमशेदपुर मेें मिले संस्कार का यह प्रतिफल है कि आज स्कूल के पूर्व छात्रों (लोयला अल्यूमिनाई एसोसिएशन) के द्वारा कई तरह के सामाजिक कार्य जैसे-साप्ताहिक स्वास्थ्य कैंप, रक्तदान शिविर एवं किसी भी आपदा के समय आगे बढक़र मदद व सामाजिक सरोकार से जुड़े कई दूसरे कार्य किए जााते हैं.
उन्होंने टीचिंग प्रोफेशन पर कहा कि मौजूदा समय में कोई भी टीचिंग प्रोफेशन को अपनाना नहीं चाहता. अभी देखने में ऐसा आता है कि बच्चों से मिली जानकारी के आधार पर अभिभावक स्थिति का आंकलन किए बगैर शिक्षकों के प्रति धारणा बना लेते हैं जो अक्सर गलत रहती है. इसका असर यह होता है कि बच्चों के मन में भी शिक्षकों के प्रति एक गांठ सी बंध जाती है.
इस स्थिति को तोडऩा बहुत जरूरी है क्योंकि यह शिक्षा और शिक्षकों की राह में बड़ा अवरोध साबित होती है. समय की मांग है कि अभिभावक गण भी शिक्षकों के प्रति अपने नजरिए को सकारात्मक रखें. ऐसा करने पर बच्चों में भी सकारात्मक प्रतिक्रिया अपने आप देखने को मिलेगी और कालांतर में टीचिंग प्रोफेशन को उसकी पुरानी गरिमा को प्राप्त करने में मदद मिलेगी. टीचिंग प्रोफेशन के प्रति युवाओं में रूझान बढ़ेगी.
शिक्षा के क्षेत्र में कार्य कर रही संस्थाओं व सरकार को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि शिक्षक बिना किसी भय या अंकुश के स्वतंत्र तरीके से पठन-पाठन को संपादित कर सकें.
शिक्षकों को भी रहना होगा अपडेट
फादर पायस ने इंटरनेट काल और इससे पहले के समय को भी देखा है. वो यह कहते हैं कि आज के समय में बच्चों को सोशल मीडिया या इंटरनेट से दूर रखना संभव नहीं है लेकिन यह जरूर संभव है कि इसके दुष्प्रभाव से बच्चों को कैसे बचाकर रखा जाए.
यह कहते हैं कि इसके लिए शिक्षकों को खुद को अपडेट रखना होगा. तभी बच्चों को इंटरनेट या सोशल मीडिया के सिर्फ सकारात्मक पहलुओं को ही आत्मसात करने के लिए प्रेरित कर सकेंगे.


