
एनआईटी जमशेदपुर में राज्यपाल ने उद्योगों को आड़े हाथ लिया, ग्रामीण विकास को लेकर कहा-पहले अंडा आया या मुर्गी
उदित वाणी, जमशेदपुरः अपने दो दिवसीय दौरे के दूसरे दिन प्रदेश के राज्यपाल रमेश बैस ने एनआईटी जमशेदपुर में सीएसआर (कारपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) करने वाले उद्योगों को लताड़ा और कहा कि वे सीएसआर के नाम पर केवल दिखावा करते हैं. कहा-मैं कुछ ऐसी बातें करूंगा, जो बुरा भी लग सकता है, क्योंकि मैं देखा हुआ हूं.
जिस क्षेत्र में उद्योग लगता है, उस क्षेत्र में कृषि योग्य भूमि समाप्त हो जाती है. उद्योग लगता है तो पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान होता है. आसपास के खेतों में फसल की पैदावार नहीं होती. जो उद्योगपति हैं, जो उद्योग लगाए हैं, क्या उनकी रिस्पांसिबिलिटी नहीं है कि जो नुकसान हो रहा है उसका भरपाई करें? इसीलिए सरकार ने जो लाभांश होता है, उसका दो प्रतिशत राशि सीएसआर के लिए आबंटित की ताकि जो स्थानीय लोग हैं, उनका विकास हो सके.
लेकिन क्या वास्तव में कोई उद्योगपति सीएसआर का दो प्रतिशत सरकार को दे पा रहा है? मैं तो देखता हूं कि मैं जब राजनीति में था तो मेरे चुनाव क्षेत्र में 5 सीमेंट प्लांट और 132 स्टील प्लांट थे. अगर किन्ही को अस्पताल जाना हो या कुछ मदद करना हो और अगर उनसे बोलो तो वे आनाकानी करते थे. पांच सीमेंट प्लांट हैं, जो नामी हैं देश के.
उनसे सीएसआर की बात करों, तो कहते हैं-हम तो कर रहे हैं? तालाब में दो सीढ़ी बना दिए. दो सीढ़ी बनाने में जितना खर्च आया होगा, उससे बड़ा वह अपना बोर्ड बनवाता था? कोई सिलाई मशीन बांट रहा है, कोई आई कैंप लगा रहा है? तो क्या इतना बड़ा उद्योग के पास इतना ही पैसा है कि वह केवल एक आई कैंप लगा दें या चार सिलाई की मशीन बांट दें तो कोई सीढ़ी बना दें? मैं जब तक राजनीति में था.
मैंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के जितने उद्योगपति थे, सबको मैंने कहा कि आप लोग अपने मन से कोई काम नहीं करेंगे? आपका सीएसआर का दो प्रतिशत पैसा कलेक्टर के पास जमा होगा. और हम तय करेंगे कि किस गांव में किस चीज की आवश्यकता है और गांव का कैसे हम विकास करेंगे? और सारे पैसे हम कलेक्टर के पास मंगाते थे और कलेक्टर के साथ बैठक कर एक कमेटी बनाकर जिस क्षेत्र का पैसा होता था, उस गांव के पंचायत से प्रस्ताव मंगाकर उसका विकास करवाते थे.
अंडा पहले आया या मुर्गी
राज्यपाल ने कहा कि एक कहावत है-अंडा पहले आया कि मुर्गी. इसका समाधान अभी तक नहीं निकल पाया है. अगर हम विस्तार से जाय तो इतना बड़ा यह विषय है कि सोचते-सोचते ऐसा नहीं हो कि हम गली में गुम हो जाय. और जब तक हम इसके लिए विस्तार से नहीं सोचेंगे ता पाएंगे कि महात्मा गांधी ने देश को स्वतंत्र कराया. और महात्मा गांधी के जो ग्रामीण विकास का उद्देश्य था. लेकिन उसके पहले गांधी जी हमें तीन बंदर भी दिखाए थे. बुरा बात मत कहो, बुरा बात मत सुनो और बुरा बात मत देखो.
हम तीनों बातें भूल गये? हम ग्रामीण विकास की बात करें तो गांधी जी की कल्पना थी कि भारत का हर गांव आत्म निर्भर बनें? जब मैं बच्चा था तो गांव में जाता था, गर्मी की छुट्टी में. स्कूल की छुट्टी होती थी. उस वक्त दो महीने की छुट्टी मिलती थी. हम दो महीना गांव में रहते थे. उस समय हम देखते थे कि गांव के लोग संतोषी होते थे. चाहे बड़ा से बड़ा किसान हो या छोटा से छोटा किसान हो.
छोटा किसान को नौकर बनने में हिचक नहीं थी और बड़ा सा बड़ा जमींदार भी हो, वह भी संतोषी होता था कि जितनी फसल पैदा हो जाय, उतने में वह संतोष कर लेता था कि भगवान की इच्छा थी कि इतना ही मेरा उत्पादन हुआ? अगर अच्छा फसल हुआ तो लड़की की शादी की तैयारी करते थे. अगर फसल खराब हुई तो शादी को अगले साल के लिए रोक देते थे. लेकिन वे चिंतित नहीं होते थे कि मेरी लड़की की शादी नहीं हो रही है? जब तक अपने आप में संतोष नहीं हो.
जब हम किसी काम करने की इच्छा करें तो हमको निस्वार्थ भाव से करना होगा. गीता में कहा गया है कि फल की प्राप्ति नहीं करों, लेकिन आज हम इस स्थिति में है कि कुछ करने के पहले हम फल की चिंता करते हैं. ग्रामीण और शहर की विषमताएं मिटने की बजाय, बढ़ रही हैं.

