
उदित वाणी जमशेदपुर : रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), अपराध अन्वेषण शाखा (सीआईबी) और उड़न दस्ते की संयुक्त कार्रवाई में टाटानगर रेलवे स्टेशन पर मानव तस्करी के एक संगठित नेटवर्क का भंडाफोड़ किया गया। ‘ऑपरेशन एएचटीयू (एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट)’ के तहत की गई इस कार्रवाई में तीन मानव तस्कर गिरफ्तार किए गए हैं, जबकि सात नाबालिग बच्चों को उनके चंगुल से मुक्त कराया गया।
यह विशेष ऑपरेशन 18 जुलाई को दोपहर 1:30 बजे शुरू हुआ, जब हावड़ा से किरो के बीच चलने वाली 22861 इस्पात एक्सप्रेस के टाटानगर स्टेशन पर आगमन की सूचना पर जांच दल सक्रिय हुआ। प्लेटफॉर्म संख्या 3 पर पहुंची ट्रेन के कोच डी-1 और डी-2 में सादी वर्दी में तैनात सुरक्षा बलों ने अचानक छापेमारी की।
गुप्त सूचना के आधार पर की गई कार्रवाई
ऑपरेशन की अगुवाई टाटानगर आरपीएफ पोस्ट प्रभारी के निर्देश पर उड़नदस्ता/सीकेपी टीम-ए, आरपीएफ पोस्ट टाटा और सीआईबी टाटा ने संयुक्त रूप से की। गुप्त सूचना मिली थी कि कुछ नाबालिग बच्चों को श्रमिक बनाकर पश्चिम बंगाल ले जाया जा रहा है। जांच के दौरान बच्चों ने अपने गंतव्य या वहां ले जाने वाले लोगों की पहचान स्पष्ट रूप से नहीं बताई, जिससे संदेह और गहराया।
पूछताछ के दौरान वयस्क पुरुषों की गतिविधियां संदिग्ध पाई गईं। नाबालिगों की भयभीत मुद्रा और भ्रमित जवाबों ने जांच टीम को हरकत में ला दिया। तुरंत इन सभी को ट्रेन से उतारकर आरपीएफ पोस्ट टाटा लाया गया, जहां विस्तृत पूछताछ की गई।
तीन मानव तस्कर गिरफ्तार, सात नाबालिग मुक्त
पूछताछ में सामने आया कि पकड़े गए तीनों व्यक्ति—रैपसान गनी (33), शेख बशीरुद्दीन (27) और मसरुल आलम (21)—पश्चिम बंगाल के विभिन्न जिलों के निवासी हैं और बाल श्रमिकों की आपूर्ति करने वाले एजेंट हैं। इन्होंने स्वीकार किया कि ये सात नाबालिगों को काम दिलाने के बहाने पश्चिम बंगाल ले जा रहे थे।
तीनों आरोपियों ने कबूल किया कि वे झारखंड और ओड़िशा से नाबालिग बच्चों को कम पैसों में नौकरी का लालच देकर ले जाते हैं और बाद में फैक्ट्रियों, ईंट भट्टों या खेतों में भारी मजदूरी करवाते हैं।
जब्त सामग्री और कानूनी कार्रवाई
छापेमारी के दौरान तीन मोबाइल फोन और ₹1300/- नकद जब्त किए गए। जब्ती की कुल अनुमानित कीमत ₹61,300/- बताई गई है। गिरफ्तार तीनों तस्करों को जीआरपीएस टाटा के हवाले कर दिया गया, मामला दर्ज कर सभी को जेल भेज दिया गया है। बचाए गए सात नाबालिग बच्चों, जिनकी उम्र 13 से 17 वर्ष के बीच है, को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत चाइल्डलाइन को सौंप दिया गया है, जहां उनकी देखभाल और परामर्श की व्यवस्था की गई है।
झारखंड-ओड़िशा से होते थे शिकार
आरोपियों ने खुलासा किया कि वे झारखंड और ओड़िशा के गरीब इलाकों से नाबालिगों को नौकरी के झूठे वादों से बहला-फुसलाकर बंगाल ले जाते थे, जहाँ उन्हें भारी मजदूरी के लिए ठेकेदारों को सौंप देते थे। बच्चों से काम तो लिया जाता, लेकिन पैसा दलालों की जेब में चला जाता।
इस ऑपरेशन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि रेलवे स्टेशनों से बाल तस्करी का खतरा अभी भी गंभीर है। आरपीएफ, सीआईबी और स्थानीय पुलिस के समन्वय से न केवल एक मानव तस्करी गिरोह का पर्दाफाश हुआ, बल्कि सात नाबालिगों को एक अंधकारमय भविष्य से भी बचाया जा सका।
रेलवे सुरक्षा बल के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि, “मानव तस्करी के विरुद्ध हमारी लड़ाई सतत जारी रहेगी। हम सभी संबंधित एजेंसियों के साथ मिलकर देश के हर प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाने के लिए कटिबद्ध हैं।”
‘ऑपरेशन एएचटीयू’ की सफलता से यह साबित होता है कि सजगता, समन्वय और समय पर कार्रवाई से मानव तस्करी जैसी सामाजिक बुराई पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। यह कार्रवाई न केवल एक उदाहरण है, बल्कि एक सख्त चेतावनी भी है उन लोगों के लिए, जो बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

