- शोभायात्रा मार्ग पर सरना झंडा लगा कर तैयारी की गई पूरी
उदित वाणी, जमशेदपुर: जमशेदपुर में आदिवासियों के महापर्व सरहुल की धूम शुरू हो गई है. सोमवार को पारंपरिक पूजा अर्चना की गई. अब केन्द्रीय सरहुल पूजा समिति पूर्वी सिंहभूम द्वारा मंगलवार एक अप्रैल को शहर में भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी. शोभायात्रा शाम 4 बजे पुराना सीतारामडेरा से प्रारम्भ होगी और लाको बोदरा चौक, एग्रिको लाइट सिग्नल, भालूबासा चौक, रामलीला मैदान, साकची गोलचक्कर, बसंत टॉकीज़, टुइलाडूंगरी, गोलमुरी होकर वापस सीतारामडेरा पहुंच संपन्न हो जाएगी. इसमें आदिवासी समाज के लोग पारम्परिक परिधान में शामिल होंगे. उरांव समाज के पूर्वी सिंहभूम के जिलाध्यक्ष राकेश उरांव ने बताया कि शोभायात्रा की तैयारी पूरी कर ली गई है. सोमवार को शोभायात्रा मार्ग पर सरना झंडा लगा दिए गए. मानगो पुल पर भी सरना झंडा लगाए गए हैं.
सोमवार को महापर्व के पहले दिन समुदाय के लोग उपवास पर रहे. इसी दिन मछली और केकड़ा भी पकड़ा गया. युवा तालाब, पोखर, चुआं या आसपास के जलस्रोतों के पास जाकर मछली और केकड़ा पकड़ लाए और घर के मुखिया ने शाम को पुरखों का स्मरण किया और उन्हें पकवान और तपावन आदि अर्पित किए. शाम में जल रखाई पूजा हुई. इसके लिए पाहन दो नये घड़ों में तालाब या नदी से पानी लाकर साफ-सुथरा किये गये सरना स्थल पर लाकर रखा.
आदिवासी समाज का मानना है कि मछली और केकड़ा ही पृथ्वी के पूर्वज हैं. समुद्र के नीचे पड़ी मिट्टी को ऊपर लाकर ही पृथ्वी बनी. इसका पहला प्रयास मछली और केकड़े ने ही किया था. सरहुल का पहला दिन इन्हीं को समर्पित होता है. पकड़े गये केकड़े को रसोई घर में ऊपर टांग दिया गया है. कुछ महीने बाद इनके चूर्ण को खेतों में इस मनोकामना के साथ छींट दिया जाएगा, ताकि जैसे केकड़े की कई भुजाएं होती हैं, उसी तरह खेतों में फसलों की भरपूर बालियां हों.
सरहुल पर रहेगी दोपहर 1 बजे से रात 11 बजे तक नो एंट्री:
सरहुल पर्व पर शहर में नो इंट्री का आदेश जारी किया गया है. 1 अप्रैल को दोपहर 1 बजे से रात 11 बजे तक यह प्रतिबंध लागू रहेगा, जिसके तहत बसों को छोड़कर अन्य सभी प्रकार के भारी वाहनों का परिचालन पूर्णतः वर्जित रहेगा. इस संबंध में प्रशासन की ओर से सर्कुलर जारी किया गया है. जमशेदपुर के उपायुक्त अनन्य मित्तल, एसएसपी किशोर कौशल और ट्रैफिक डीएसपी ने संयुक्त रूप से यह आदेश जारी किया है. शहरवासियों से अपील की गई है कि वे नो इंट्री के नियमों का पालन करें और प्रशासन का सहयोग करें ताकि सरहुल पर्व शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रूप से संपन्न हो सके.
शक्तिमान सूर्य एवं कन्या रूपी धरती का विवाह
सरहुल के दिन सृष्टि के दो महान स्वरूप शक्तिमान सूर्य एवं कन्या रूपी धरती का विवाह होता है. जिसकी कुड़ुख या उरांव में खेखेल बेंजा कहते हैं. इसका प्रतिनिधित्व क्रमश: उरांव पुरोहित पहान (नयगस) एवं उसकी धर्मपत्नी (नगयिनी) करते हैं. इनका स्वांग प्रतिवर्ष रचा जाता है. उरांव संस्कृति में सरहुल पूजा के पहले तक धरती कुंवारी कन्या की भांति देखी जाती है. धरती से उत्पन्न नए फल-फूलों का सेवन वर्जित है. इस नियम को कठोरता से पालन किया जाता है. पहान घड़े का पानी देखकर बारिश की भविष्यवाणी करते हैं. पहान सरना स्थल पर पूजा संपन्न करता है और तीन मुर्गों की बलि दी जाती है और खिचड़ी बनाकर प्रसाद के रूप में खाते हैं. फिर पहान प्रत्येक घर के बुजुर्ग या गृहिणी को चावल एवं सरना फूल देते हैं, ताकि किसी प्रकार का संकट घर में न आए. सरहुल के एक दिन पहले केकड़ा खोदने का रिवाज है. केकड़ा को पूर्वजों के रूप में बाहर लाकर सूर्य और धरती के विवाह का साक्षी बनाया जाता है. सरहुल के बाद ही खरीफ फसल की बोआई के लिए खाद और बीज डाला जाता है.
आदिवासियों के लिए सरहुल का महत्व :
सरहुल पर्व विशेष रूप से प्रकृति की पूजा के लिए मनाया जाता है. इस पर्व में सखुआ फूल का बहुत महत्व है. सरहुल पूजा के दौरान सखुआ का फूल चढ़ाया जाता है. सरहुल आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा को दर्शाता है. इस त्यौहार के बाद ही आदिवासी कोई भी नया काम शुरू करते हैं. सरहुल पूजा के बाद ही किसान खेती का काम शुरू करते हैं. आदिवासी हमेशा से प्रकृति की पूजा करते हुए यहां आते रहे हैं, प्रकृति और आदिवासियों के बीच एक अटूट रिश्ता है. प्रकृति आदिवासियों के अस्तित्व का स्रोत है. सरहुल पर्व हमें प्रकृति को बचाने का संदेश देता है. यह झारखंड में कई जनजातियों द्वारा मनाया जाता है, विशेषकर मुंडा, हो और ओरांव जनजातियों द्वारा.
सरहुल पर्व से जुड़ी रीती रिवाज और परंपरा :
सरहुल पूजा में पृथ्वी और सूर्य का विवाह कराया जाता है. इस दिन साल वृक्ष की भी पूजा की जाती है और अच्छी फसल के लिए प्रार्थना की जाती है. सरहुल पहले दिन 2 घड़ों में पानी भरा जाता है और दूसरे दिन पूजा की जाती है और देखा जाता है कि घड़े से पानी किस तरफ से बह रहा है. ऐसा माना जाता है कि जिस दिशा से पानी बहता है, उसी दिशा से वर्षा होती है. यदि घड़े से अधिक पानी बहता है तो माना जाता है कि उस वर्ष अधिक वर्षा होगी. इस दिन से जुड़ी कुछ अन्य मान्यताएं भी हैं, जैसे कि खिचड़ी पाहन या पुजारी द्वारा बनाई जाती है. ऐसी मान्यता है कि जिस दिशा से खिचड़ी उबलने लगती है, उसी दिशा से बारिश होने लगती है.
उदित वाणी टेलीग्राम पर भी उपलब्ध है। यहां क्लिक करके आप सब्सक्राइब कर सकते हैं।