
संवाद ने जनजातीय समुदायों की आवाज़ों को सामने लाने के प्रयास को उजागर किया
गोपाल मैदान में लगी हस्त शिल्प प्रदर्शनी में मड़ुआ का लड्डू बना आकर्षण का केन्द्र
उदित वाणी, जमशेदपुर : संवाद 2025 ने चौथे दिन आदिवासी समुदायों की आवाज़ों को बढ़ावा देने के समागम के दृष्टिकोण को और मजबूत किया, जहां वे आदिवासी ज्ञान, सामुदायिक नेतृत्व और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की बढ़ती प्रासंगिकता पर चिंतन करने के लिए एकत्र हुए. यह दिन अखडा में कई सत्रों के साथ शुरू हुआ, जहां प्रतिभागियों ने आदिवासी दृष्टिकोण से विकास पर चर्चा की. कला और हस्तशिल्प सत्र में उत्पादों की बाजार प्रासंगिकता को समझने पर ध्यान केंद्रित किया गया. आदिवासी उपचार पद्धतियों ने स्वास्थ्यकर पारंपरिक व्यंजनों पर चर्चा की और समुदाय के साथ नामक सत्र ने सिनेमाई लेंस के माध्यम से जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की गहराई में प्रवेश किया.

राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतियोगिता
समुदाय के साथ आठवें राष्ट्रीय लघु फिल्म प्रतियोगिता 2025 का शानदार रिस्पांस रहा. इसमें 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 11 जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले 38 फिल्म निर्माताओं की ओर से कुल 42 फिल्म प्रविष्टियां आईं. सामुदायिक श्रेणी में रमेश कुमार हेम्ब्रम (संथाल, ओडिशा) द्वारा निर्देशित पुईसे दारे, द मनी प्लांट और रोहित मरांडी (संथाल, ओडिशा) द्वारा निर्देशित ओलोह में बाबू को विजेता घोषित किया गया, जबकि मनोज कुमार (उरांव, झारखंड) की फूलों को विशेष जूरी उल्लेख प्राप्त हुआ. पुईसे दारे, द मनी प्लांट ने लोकप्रिय पसंदीदा पुरस्कार भी हासिल किया.

सिनेमा के माध्यम से जनजातीय आवाज
टाटा स्टील फाउंडेशन के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर सौरव रॉय ने कहा: “संवाद, पिछले आठ वर्षों से आदिवासी समुदायों को सिनेमा के माध्यम से उनके मुद्दों और आकांक्षाओं को आवाज़ देने के लिए एक मंच प्रदान कर रहा है. इसलिए, ‘समुदाय के साथ’ का यह राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव इस यात्रा में उभरते हुए फिल्म निर्माताओं को जोड़ना और उन तक पहुंचना चाहता है. इस वर्ष 72 से अधिक फिल्म निर्माताओं ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और यह साबित किया कि रचनात्मक प्रवृत्ति की कोई कमी नहीं है, इसे सही दिशा में पोषित किया जाना चाहिए.”

बाय द होम को पहला पुरस्कार
संस्थागत श्रेणी में मनकप नोकवोहम (वांचो, अरुणाचल प्रदेश) द्वारा निर्देशित बाय द होम ने पहला स्थान हासिल किया. उसके बाद दूसरे स्थान पर लक्ष्मीनारायण देवड़ा (कोरकू, मध्य प्रदेश) की म्हारी टोपली मा केकड़ा और तीसरे स्थान पर रोशनी चौहान (भीलारा, मध्य प्रदेश) की सशक्त नारी, समर्थ ग्राम (शी बिगेन्स टू लीड) रही. राज मोहन सोरेन (संथाल, झारखंड) द्वारा निर्देशित ब्लैक गोल्ड और सृष्टि मरांडी (संथाल, झारखंड) द्वारा निर्देशित पैलिम्प्सेस्ट को विशेष जूरी उल्लेख से सम्मानित किया गया. बाय द होम को लोकप्रिय पसंदीदा पुरस्कार भी मिला. इस वर्ष के संस्करण में पुरुष और महिला फिल्म निर्माताओं दोनों की सक्रिय भागीदारी देखी गई.

संथाल, मिजो, माविलन, गुर्जर और सबर समुदायों ने की प्रस्तुति
शाम के सांस्कृतिक प्रदर्शन ने भारत की आदिवासी विरासत की जीवंतता का जश्न मनाया. संथाल, मिज़ो, माविलन, गुर्जर और सबर समुदायों के प्रदर्शन ने विभिन्न कहानियों, लय और परंपराओं को जीवंत कर दिया. इसके बाद हॉर्नबिल कोहोर्ट और सिक्किम के सूफ़ियम संगीत बैंड द्वारा रोमांचक प्रस्तुतियां दी गईं, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.

जनजातीय खानपान
आतिथ्य – आदिवासी फ़ूड पॉप-अप पर आगंतुकों की भीड़ बनी रही, जहां उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय रसोइयों द्वारा तैयार किए गए आदिवासी व्यंजनों का स्वाद लिया. इसके अलावा गोपाल मैदान में कला एवं हस्तशिल्प और पारंपरिक उपचार के आउटलेट्स ने एक बार फिर अपनी प्रामाणिकता और सांस्कृतिक गहराई के लिए प्रशंसा बटोरी.

मडुआ के लड्डू
मेले में मड़ुआ के बने लड्डू आकर्षण के केन्द्र है. मधुमेह के रोगियों के लिए यह लड्डू बेहतर है. गुड़ और घी से बना यह लड्डू 200 रूपए में मिल रहा है. यही नहीं कला और शिल्प के विभिन्न स्टॉल पर देश के विभिन्न प्रदेशों की कला की खुशबू बिखरी हुई है. पूर्वोत्तर के असम, मेघालय, अरूणांचल प्रदेश आदि प्रदेशों के हस्तशिल्प आकर्षण के केन्द्र बने हुए है. इसके अलावा झारखंड, ओडिशा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, छतीसगढ़ के स्टॉलों पर भी काफी भीड उमड़ रही है. उधर, जनजातीय प्राकृतिक चिकित्सा के स्टॉल पर भी लोगों की काफी भीड़ है. लाइफ स्टाइल डिजिज के अलावा बाल झड़ने से लेकर पेट खराब होने, ज्वाइंट्स पेन की भी दवाएं उपलब्ध हैं.

