
उदित वाणी, आदित्यपुर: जयप्रकाश उद्यान, आदित्यपुर में चल रहे श्रीमन्ननारायण महायज्ञ के चौथे दिन स्वामी चिन्ताहरण जी ने रामकथा पर प्रवचन प्रस्तुत किया. उन्होंने बताया कि जब श्रीराम अपने वन गमन के रास्ते पर थे, तब उन्हें सही मार्ग को लेकर कई लोगों से विभिन्न सुझाव मिले. ऐसे में स्वामी चिन्ताहरण ने यह कहा कि जब भी जीवन में किसी मार्ग का चयन करना हो और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो, तो वेद की बात सुननी चाहिए. वेद का मार्गदर्शन हमेशा सही दिशा में ले जाता है.
राम कथा का असली संदेश
स्वामी श्री सर्वेश्वरानन्द ने भी इस अवसर पर रामकथा के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि रामकथा सुनने के दौरान अभिमान नहीं रखना चाहिए. राम कथा उन लोगों के लिए नहीं है जो अहंकार से भरे हों. उन्होंने संत के लक्षण पर भी चर्चा की और बताया कि संत वे होते हैं जो सरल और विनम्र होते हैं. संत की पहचान उनके स्वभाव और वाणी से होती है.
आध्यात्मिक विनम्रता का महत्व
स्वामी सर्वेश्वरानन्द ने यह भी बताया कि शंकर जी की अर्धांगिनी सती को भी अगस्त्य ऋषि और श्रीराम द्वारा सम्मान दिए जाने से अहंकार की भावना उत्पन्न हुई थी, जो संतों के मार्ग के विपरीत है. उन्होंने रामकथा में तीन तरह के प्रणाम का उल्लेख किया—हाथ जोड़कर, चरणों में मस्तक छूकर, और पृथ्वी पर पुस्तक न रखने की सलाह दी. इसके अलावा, उन्होंने यह भी कहा कि जलते हुए दीपक को कभी पृथ्वी पर नहीं रखना चाहिए और शालीग्राम भगवान को जमीन पर नहीं रखना चाहिए.
समारोह में श्रद्धालुओं की भारी भीड़
इस अवसर पर बड़ी संख्या में महिला और पुरुष श्रद्धालु उपस्थित थे, जिन्होंने स्वामी जी के प्रवचन को ध्यान से सुना और उनके उपदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया.

