
उदित वाणी, जमशेदपुर: लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज जमशेदपुर में इतिहास विभाग द्वारा नई शिक्षा नीति के तहत चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम के लिए व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया.
इसका विषय था वसुधैव कुटुंबकम की भारतीय अवधारणा. विषय प्रवेश कराते हुए डॉ. नुपूर ने कहा कि अफ्रीका से प्राम्भिक मानवों का प्रवेश भारत में हुआ और यहाँ कई जाति और जनजातियों में बंट गई. परंतु भारतीय साहित्य एक विश्व की बात करते हैं. व्याख्यानमाला की अध्यक्षता प्राचार्य डॉ. एके झा ने की.
मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. अमरेश कुमार (इतिहास विभाग, एबीएम कॉलेज) उपस्थित थे. मंच का संचालन डॉ. नुपूर राय और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. मोहन साहू के द्वारा किया गया.
व्याख्यानमाला की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डॉ. एके झा ने कहा कि इस धरती का निर्माण ईश्वर ने किया परंतु इंसानों ने इसे क्षेत्र, राज्य, देश आदि में विभाजित कर दिया. उन्होंने आगे बताया कि जिस समय विश्व के अधिकांश देशों में में लेखन शैली का अविष्कार नहीं हुआ था, उस समय भारत में विश्व एकता और विश्व कल्याण की चिंतन प्रारंभ हो चुका था.
प्राचीन साहित्यों मे वसुधैव कुटुंबकम से कई संदर्भ भरे पड़े हैं. वसुधैव कुटुंबकम भारतीय संस्कृति का मूल है. उक्त विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. अमरेश कुमार ने कहा कि वसुधैव कुटुंबकम सभी समस्याओं का समाधान है.
सबको साथ लेकर चलना ही वसुधैव कुटुंबकम है. अशोक के धम्म और अकबर के दिन-ए-इलाही में भी वसुधैव कुटुंबकम की भावना निहित है. वास्तव में वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा काफी व्यापक है. यह प्राचीन काल में जितनी अधिक प्रासंगिक थी उतनी ही आज भी है. भारत ने न तो प्राचीन काल में में साम्राज्यवाद का समर्थन किया और न ही आज समर्थन करता है.
विषय पर और अधिक प्रकाश डालते हुए कहा कि कोरोना काल में भारत ने अन्य देशों की सहायता कर वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा की महत्ता स्पष्ट कर दी.
समय-समयअपने पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका आदियों की सहायता कर वसुधैव कुटुंबकम की भारतीय परंपरा को सार्थक करता रहा है. इस अवसर पर डॉ. शबनम परवीन, डॉ. सुधीर कुमार, प्रो. सलोनी रंजने, डॉ. कुमारी रानी एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित थे.

