
संस्थापक की दो सौंवीं जयंती पर बहुत कुछ बदल जाएगा टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टाटा पावर व ग्रुप की कई कंपनियों में
उदित वाणी, जमशेदपुर: आज हम टाटा स्टील और टाटा ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी नौशेरवानजी की 184वीं जयंती मनाने जा रहे हैं. निस्संदेह जमशेदपुर के लिए यह खास मौका होता है जब शहर के लोग अपने संस्थापक को शिद्दत से याद करते हैं. टाटा स्टील की स्थापना से अब तक न केवल शहर बल्कि टाटा स्टील का परिदृश्य भी पूरी तरह से बदल गया है. कभी धुआं उगलनेवाले प्लांट थे तो अब कार्बन को जब्त करनेवाले प्लांट लगे हैं. क्लाइमेट चेंज के खतरों ने बदलाव की जो बयार बहाई है, उससे कोई भी बचा नहीं है. स्टील उद्योग पर नजर खास है क्योंकि उत्सर्जन रोकने की तमाम कोशिशों के बाद भी आज भी सीओटू उत्सर्जन पर पूरी तरह काबू नहीं पाया जा सका है. लेकिन बदलते परिवेश के साथ कदम ताल कर रहा टाटा स्टील भी खुुद को डीकार्बोनाइज करने की तरफ अग्रसर है और 2030 तक का रोडमैप भी तैयार कर लिया है. 2039 में जब संस्थापक की 200वीं जयंती मनाई जाएगी तो टाटा स्टील ज्यादा ग्रीन, क्लीन और सस्टेनेबल दिखेगा.
4.5 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की जरूरत
वर्ष 2030 तक भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमी से तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य लेकर चल रहा है. ऐसा संभव भी है अगर इस दिशा में उठाया गया हर कदम ठीक जगह पर पड़े. इस मंजिल को हासिल करने में सबसे बड़ा योगदान किसी एक सेक्टर का होगा तो वो निर्विवाद रूप से स्टील सेक्टर का ही होगा. लेकिन 2017 में घोषित राष्ट्रीय इस्पात नीति में स्टील उत्पादन का जो लक्ष्य तय किया गया है, वो हासिल करना आसान नहीं होगा क्योंकि स्टील कंपनियों की उत्पादन प्रक्रिया में भी क्लाइमेट चेंज के नकारात्मक असर को दूर करने के लिए बदलाव का भारी दबाव है. 2030 तक 300 मिलियन टन सालाना उत्पादन लक्ष्य हासिल करने पर स्टील सेक्टर देश के लिए ग्रोथ मल्टीप्लायर बनकर उभरेगा. लेकिन स्टील उत्पादन की प्रक्रिया मेंं बड़ी मात्रा में कार्बन डायक्साइड (सीओटूू) निकलता है और वैश्विक एमिशन (निस्सरण) का 8 फीसदी भारत में होता है. स्टील सेक्टर बडी़ पूंजी, जटिल उत्पादन प्रक्रिया तथा बल्क रॉ मैटेरियल पर निर्भर होता है. इसके अलावा साइक्लिक ग्रोथ, प्रोफेटिबलिटी ट्रेंड और पीरियोडिक ओवर कैपिसिटी भी इस पर असर डालते हैं.वैसे इस दिशा में सारा कुुछ नकारात्मक ही नहीं है, हाल के दशकों में स्टील इंडस्ट्री ने ऊर्जा की लागत और सीओटू एमिशन की कमी में अहम उपलब्धियां हासिल की हैं. इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस के बढ़ते इस्तेमाल और स्टील उत्पादन के क्रम में जाया होनेवाली (वेस्ट) एनर्जी के रीयूज से कंपनियों ने प्रति टन स्टील के उत्पादन में 1960 से अब तक करीब 61 प्रतिशत की कमी लाने में कामयाबी हासिल की है. हालांकि ग्रीन हाउस गैसों (जीएचजी) के एमिशन में इससे अपेक्षित नतीजे हासिल नहीं हो सके हैं. ऊर्जा दक्षता के मोर्चे पर अब भी 15 से 20 प्रतिशत कमी लाने की संभावना बनी हुई है.
ब्रेकथ्रू टेक्नोलॉजी से बनेगा काम
आधुनिक स्टील प्लांट व्यावहारिक थर्मोडायनामिक्स एफिशिएंसी पर काम करते हैं. इसलिए स्टील की उत्पादन प्रक्रिया में कार्बन फुटप्रिंट अपेक्षित स्तर पर घटाने के लिए ब्रेकथ्रू टेक्नोलॉजी का विकास अनिवार्य होगा. इसके दो तरीके हो सकते हैं: एक तो वर्तमान उत्पादन प्रक्रिया में ही कार्बन को जब्त करने की तकनीक हासिल की जाए और दूसरा कार्बन के स्थान पर ग्रीन रिडक्टेंट्स मसलन हाइड्रोजन का इस्तेमाल करना. इसके लिए पानी के इस्तेमाल की सीमा भी तय करनी होगी. ग्रीन स्टील सेक्टर वैल्यू चेन की तेज गति से स्केलिंग और वैल्यू हासिल करने के लिए कई तरह के डिजिटल सोल्यूशंस और इंडस्ट्री 4.0 टेक्नीक अमल में लानी पड़ेगी. मैकिंजी की पिछले साल की रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्बन से हाइड्रोजन में संक्रमण के लिए पूरी दुनिया में स्टील उत्पादकों को अगले तीन दशक में करीब 4.5 ट्रिलियन डॉलर का निवेश करना होगा. इसके लिए इकोसिस्टम के साझेदारों सरकार, नियामक, बैंक और स्टील उत्पादकों के बीच आपसी समन्वय बनाना होगा. हाइड्रोजन डायरेक्ट रिडक्शन (एचडीआर) नामक तकनीक जिसे हाइब्रिट भी कहा जाता है, में स्टील उत्पादन की प्रक्रिया में प्राकृतिक गैस (भारत में कोकिंग कोयले से गैस बनती है जिसे कोक ओवन गैस कहते हैं) की जगह हाइड्रोजन का इस्तेमाल किया जाता है. यूरोपीय स्टील कंपनियां 2024 में इसका पायलट ट्रायल करने की तैयारी कर रही हैं. अगर अपेक्षित नतीजे मिले तो यह तकनीक या इस तरह की कोई दूसरी तकनीक भारतीय स्टील प्लांट्स भी अपना सकते हैं. इस तकनीक के इस्तेमाल से कार्बन एमिशन में 80 से 90 फीसदी तक कमी हो सकती है. लेकिन इसके कमर्शियल पहलूू पर भी गौर करना पड़ेगा. इसके लिए सहायक उद्योगों (एंसिलियरीज) की स्थापना भी करनी पड़ेगी.
टाटा स्टील भी ग्रीन स्टील की ओर
बदलते दौर की जरूरत को अंगीकार कर टाटा स्टील (इंडिया) ने भी ग्रीन स्टील की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं. टाटा स्टील ने जमशेदपुर कारखाने में 5 टन रोजाना क्षमता का कार्बन (सीओटू) कैप्चर प्लांट लगाया है जो कार्बन को कैप्चर करनेवाला देश के किसी स्टील प्लांट में लगा ऐसा पहला प्लांट है.इस जब्त हुए कार्बन का इस्तेमाल स्टील मेल्टिंग शॉप में किया जाता है. कंपनी इस दिशा में आगे भी काम कर रही है और उसका लक्ष्य सीओटूू के कैप्चर, स्टोरेज और इस्तेमाल की बेहतर तकनीक हासिल करने का है. यहां तक कि कंपनी के बारे में अहम फैसले लेते वक्त कार्बन प्राइसिंग जरूरी विषय होता है. कम कार्बन के बिजनेस मॉडल पर भी मंथन होता रहता है.इसके अलावा टाटा स्टील ने एक स्टार्ट अप के साथ मिलकर बायोमास से सिनगैस (हाइड्रोजन और कार्बन मोनोक्साइड की 4:1 के अनुपात में मिश्रित गैस) उत्पादन की तकनीक का विकास किया है. कंपनी की योजना स्टील वैल्यूू चेन में ग्रीन/ब्लू हाइड्रोजन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की है. 2030 तक टाटा स्टील का लक्ष्य प्रति टन क्रूड स्टील के उत्पादन में 1.8 टन से कम सीओटू गैस (<१.८ ह्लष्टह्र२/ह्लष्ह्य) का स्तर हासिल करना है. टाटा स्टील के इकोसिस्टम में सस्टेनिबिलिटी गहरे पैठ चुका है. कंपनी ने डीकार्बोनाइजेशन के लिए रोड मैप भी तय कर लिया है. इसके लिए कंपनी का फोकस लो कार्बन तकनीकों पर है.
2030 तक होगा 40 मिलियन टन उत्पादन
उल्लेखनीय है कि टाटा स्टील का लक्ष्य 2030 तक उत्पादन बढ़ाकर 40 मिलियन टन करने का है. वर्ष 2018 में टाटा स्टील का उत्पादन 13 मिलियन टन था जो इसी साल भूषण स्टील और टाटा स्टील लांग प्रोडक्ट्स (पूर्ववर्ती उषा मार्टिन) के अधिग्रहण से इसकी क्षमता 2020 में बढ़कर 19 मिलियन टन हो गई. इसके अलावा कलिंगानगर प्लांट के दूसरे फेज का विस्तारीकरण चल रहा है जो 2025 तक पूरा होगा तो अतिरिक्त 5.8 मिलियन टन क्षमता जुुड़ेगी. पिछले साल कंपनी ने नीलाचल इस्पात का अधिग्रहण किया जिसकी वर्तमान क्षमता 1 मिलियन टन की है और इसमें विस्तार की संभावना है. विशाखापट्टनम के राष्ट्रीय इस्पात निगम का भी विनिवेश सरकार के एजेंडे में है जो राजनीतिक कारणों से रुका हुआ है. जब यह प्रक्रिया आगे बढेगी तो टाटा स्टील भी इसकी दौड़ में होगा. इस प्रकार आर्गेनिक और इनआर्गेनिक तरीके से कंपनी और उत्पादन क्षमता बढ़ाएगी और उसे उम्मीद है कि वर्ष 2030 तक कुुल उत्पादन क्षमता बढ़कर 40 मिलियन टन के करीब हो जाएगी.
कनेक्टेड लिविंग, इंडस्ट्र्री 4.0
टाटा स्टील भी वक्त के साथ कदमताल करते हुए इंडस्ट्री 4.0 अमल में ला रही है. इंडस्ट्री 4.0 या चौथी औद्योगिक क्रांति मानव जीवन की विकास यात्रा को ‘स्मार्ट लाइफÓ की ओर ले जाने का माध्यम है. इसका मुख्य उपकरण इंटरनेट है. इस मामले में भारत की स्थिति देखें तो दुनिया में सर्वाधिक मोबाइल डाटा की खपत भारत में है तथा सबसे सस्ता डाटा भी यहीं उपलब्ध है.जीवन के हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल हो रहा है. स्टील कारोबार में भी डिजिटाइजेशन का दौर चल रहा है. कारोबार में डिजिटल सोल्यूशंस तथा इनोवेशन के जरिए एक सिस्टम खड़ा किया जा रहा है ताकि रीयल टाइम डेटा हासिल हो सके. इसके अलावा स्टील के वैल्यू चेन में आर्टिफिशियल इंटेेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल कर उसे और स्मार्ट बनाया जा रहा है.
सर्कुलर इकोनॉमी के लिए स्टील रिसाइक्लिंग
स्टील का एक खास गुण होता है कि इसे चाहे जितनी बार रिसाइकिल किया जाए, इसका कैरेक्टर नहीं बदलता. इसलिए स्टील स्क्रैप की बढ़ती उपलब्धता के मद्देनजर इसके रिसाइक्लिंग प्लांट लगाए जा सकते हैं. इसे टाटा स्टील ने तो पहले ही यह काम शुुरू कर दिया है. टाटा स्टील ने बेहतर कल की प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाते हुए हरियाणा के रोहतक में 0.5 एमएनटीपीए का पहला री-साइक्लिंग प्लांट शुरू किया है. इस प्लांट को मेसर्स आरती ग्रीन टेक लिमिटेड के सहयोग से बिल्ड ऑन ऑपरेट (बीओओ) पार्टनर द्वारा स्थापित किया गया है.पहला ऐसा प्लांट है जो आधुनिक और मशीनीकृत उपकरणों जैसे श्रेडर, बेलर, मैटेरियल हैंडिलिंग जैसे उपकरणों से लैस है. टाटा स्टील ने देश भर की कंपनियों से पुराने वाहनों, इंडस्ट्रीयल व घर के पुराने सामानों व कबाड़ को खरीदने व एकत्रित करने के लिए एक स्क्रैप एप फेरोहाट बनाया है. जिसकी मदद से स्क्रैप को एकत्रित कर उसे प्रोसेस किया जा रहा है.स्क्रैप को प्रोसेस कर उच्च गुणवत्ता वाले डाउनस्ट्रीम स्टील उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं. इससे कार्बन उत्सर्जन तो कम हो ही रहा है, संसाधन व ऊर्जा की खपत भी कम हो रही है. टाटा स्टील ने बेल्ड और श्रेडेड फेरस स्क्रैप के लिए दो नए ब्रांड टाटा फेरोबेल्ड व टाटा फेरोश्रेड को भी लांच किया है. ये न केवल गुणवत्ता व प्रोसेस्ड आयरन स्क्रैप उपलब्ध कराएंगे बल्कि आयात पर निर्भरता को भी कम कर भारतीय स्टील कंपनियों को कच्चा माल भी उपलब्ध कराएगी.
लुुधियाना में भी रिसाइक्लिंग प्लांट
पंजाब के लुधियाना की हाईटेक वैली में भी टाटा स्टील का रिसाइक्लिंग प्लांट लगने जा रहा है. इसमें कुल 2600 करोड़ रुपये का निवेश होगा और पूरा प्लांट 115 एकड़ में बनेगा. जमीन पंजाब सरकार ने उपलब्ध करा दी है.
5 मिलियन टन रिसाइक्लिंग का लक्ष्य
अब रिसाइक्लिंग टाटा स्टील के बिजनेस मॉडल का हिस्सा बन चुका है. पंजाब और हरियाणा के अलावा दूसरे राज्यों में भी कंपनी का इरादा रिसाइक्लिंग प्लांट लगाने का है. 2030 तक रिसाइक्लिंग के जरिए उत्पादन क्षमता बढ़ाकर 5 मिलियन टन सालाना करने की योजना पर कंपनी काम कर रही है.
हाइड्रोजन : टाटा मोटर्स के लिए भविष्य का ईंधन
जमशेदपुुर में शुरू हुई देश की सबसे बड़ी ऑटो और मोबिलिटी सोल्यूशन कंपनी टाटा मोटर्स भी स्थायी गतिशीलता को अपनाने और ‘नेट जीरोÓ कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को पूरा करने को तेजी दे रही है.जमशेदपुर में 1945 में स्थापित कंपनी का नाम तब टेल्को (टाटा इंजीनियरिंग एंड लोकोमोटिव्स कंपनी) था और तब कंपनी लोकोमोटिव्स (रेल इंजन) बनाती थी. 1954 में जर्मन कंपनी डेमलर बेंज के साथ साझेदारी में टाटा मोटर्स ने कमर्मियल वाहनों (ट्रक) का उत्पादन शुरू किया. इसी साल पहले ट्रक का भी निर्माण हुआ. इसके बाद के सफर मेें टाटा मोटर्स न केवल आत्मनिर्भर हुआ बल्कि जमशेदपुर के बाद पुणे, लखनऊ, पंतनगर (उत्तराखंड) और साणंद (गुजरात) में इसके ऑटो मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है. अब तो कंपनी छोटी कारों से लेकर हैवी ड्यूटी ट्रकों तथा अन्य वाहनों का निर्मांण कर रही है. वर्तमान में टाटा मोटर्स पर्यावरण के अनुकूल भविष्य के जनादेश की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जिसमें कार्बन उत्सर्जन को कम करने के सामूहिक प्रयास तुरंत शुरू करने की जरूरत है. 2040 तक ‘नेट-जीरोÓ उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के साथ, कंपनी अपनी तीसरी जेनरेशन की ईवी आर्किटेक्चर की रणनीति के दम पर इस मिशन का नेतृत्व कर रही है.
पिछले महीने ही नई दिल्ली में आयोजित ऑटो एक्सपो में कंपनी ने अपने भविष्य की झलक पेश की जिसमें हाइड्रोजन से चलनेवाले कान्सेप्ट वाहन शामिल थे. टाटा ग्रुप के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने ऑटो एक्स्पो में कहा था,”हम अपने हर बिजनेस में स्थिरता, ऊर्जा हस्तांतरण और डिजिटलाइजेशन के नेतृत्व में बदलाव की नींव रख रहे हैं. हमारा शून्य उत्सर्जन करने वाली पावर ट्रेन, अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी, आधुनिक डिजाइन इंजीनियरिंग और बेहतरीन सेवाओं पर खास फोकस है. टाटा मोटर्स स्थायी गतिशीलता को अपनाने और ‘नेट जीरोÓ कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य को पूरा करने को तेजी दे रही है. ऑटो एक्सपो 2023 में, अपनी नई जमाने की गाडिय़ों, कॉन्सेप्ट और स्मार्ट मोबिलिटी सॉल्यूशंस के जरिए भविष्य को लेकर हमारा विजन और इसका मैनिफेस्टेशन पेश कर हम काफी गर्व महसूस कर रहे हैं.
हाइड्रोजन फ्यूल सेल
जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने, वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने और दुनिया भर में ऊर्जा आपूर्ति का लोकतांत्रिकरण करने के मामले में हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी (हाइड्रोजन ईंधन सेल तकनीक) शायद आज के समय में हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है. सीधे शब्दों में कहें तो हाइड्रोजन फ्यूल सेल बिजली पैदा करने के लिए हाइड्रोजन की रासायनिक ऊर्जा का इस्तेमाल करता है और उप-उत्पादों के रूप में पानी और गर्मी के साथ बिजली का उत्पादन करने के लिए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को जोड़ता है.इस तकनीक के मूल में ईंधन सेल समूह है, जो रासायनिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है. यह इनपुट के रूप में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का उपयोग करके बिजली पैदा करता है. हाइड्रोजन का इस्तेमाल करने के लिए उसे स्टोर करना पड़ता है और इसके लिए एक हाइड्रोजन टैंक की जरूरत होती है. इस ईंधन सेल स्टैक (समूह) से पैदा हुई बिजली को किसी अन्य बीईवी (बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) की तरह बैटरी में स्टोर किया जाता है.हालांकि, शुद्ध बैटरी इलेक्ट्रिक वाहनों (बीईवी) की तुलना में बैटरी आकार में बहुत छोटी है. यह परिवहन, औद्योगिक / वाणिज्यिक / आवासीय भवनों और रिवर्सेबल सिस्टम्स में दीर्घकालिक ग्रिड-आधारित ऊर्जा भंडारण सहित कई क्षेत्रों में कई तरह के इस्तेमाल के लिए ऊर्जा की आपूर्ति के लिए उपयुक्त है. केंद्र सरकार के राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन और भविष्य में हमारे देश को ऊर्जा-स्वतंत्र बनाने के लिए भारत को हरित हाइड्रोजन उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनाने की योजना में टाटा मोटर्स ने आगे बढ़कर पहल की है. टाटा मोटर्स इस मामले में शुरुआती प्रस्तावक था और पहले ही हाइड्रोजन ईंधन सेल संचालित वाहनों के विकास की दिशा में काफी प्रगति कर चुका है. पिछले कुछ समय से, एक समर्पित अनुसंधान एवं विकास केंद्र (आरएंडडी सेंटर) संचालन में है, जो भविष्य के लिए तैयार गतिशीलता समाधान की पेशकश के लिए तकनीकी के फायदों का लाभ उठाने की खोज कर रहा है.इस तकनीक को समझने और अनुकूलित करने के लिए 40-50 बेहतरीन दिमागों की एक टीम को काम सौंपा गया है.लेकिन किसी भी नई तकनीक की तरह, इसमें भी कुछ समय लगेगा जब तक कि फ्यूल सेल ट्रक, बस और कार भारतीय सड़कों पर सामान्य घटनाक्रम न हो जाएं. तकनीकी और उत्पादों के अलावा, हरित ईंधन का समर्थन करने के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे का निर्माण करने की जरूरत है. नजदीकी भविष्य में इस तकनीक की मांग में बढ़ोतरी की उम्मीद है. सभी नई तकनीकों की तरह, यह बीतते समय में बढऩे के साथ और ज्यादा किफायती हो जाएगी, जो एक समेकित, इकोसिस्टम केंद्रित नजरिए को बढ़ावा देगा.
क्या है हाइड्रोजन फ्यूल सेल बस
ऑटो एक्सपो 2023 के आखिरी दिन टाटा मोटर्स हाइड्रोजन फ्यूल सेल से चलने वाली अपनी बस स्टारबस फ्यूल सेल का अनावरण किया.यह हाइड्रोजन की ऊर्जा से चलने वाली इलेक्ट्रिक बस है जिसे कंपनी ने पहली बार 2018 में पेश किया था.चूंकि यह बस हाइड्रोजन से चलती है, कंपनी का दावा है कि इस बस से शून्य उत्सर्जन होता है. कंपनी के अनुसार, इसके इंजन में हाइड्रोजन के जलने के बाद उत्सर्जन के तौर पर सिर्फ पानी निकलता है. बस में मैकेनिकल इंजन के न होने के वजह से यह चलते समय आवाज नहीं करती और यात्रियों को पूरी तरह शांत सफर का अनुभव मिलता है.डीजल से चलने वाली बस का इंजन केवल 20 प्रतिशत ही ऊर्जा को पॉवर में बदला जा सकता है. जबकि फ्यूल सेल बस 40-60 प्रतिशत ऊर्जा को पॉवर में बदलता है, जो कि साधारण बस से 3 गुना अधिक एफिसिएंट है. इस वजह से एक डीजल बस के मुकाबले फ्यूल सेल बस 50 प्रतिशत ईंधन की बचत करता है.टाटा की फ्यूल सेल स्टारबस बस में 30-सीटर है. इस बस के छत पर चार हाइड्रोजन फ्यूल सेल लगाए गए हैं. प्रत्येक फ्यूल सेल की क्षमता लगभग 14.5 किलोग्राम की है. बस के फ्यूल सेल सिस्टम को लिथियम-आयन बैटरी से जोड़ा गया है. बस की कंट्रोलिंग को आसान बनाने के लिए इसमें हाइड्रोलिक पॉवर स्टीयरिंग, एयर डुअल सर्किट ब्रेक और एबीएस का इस्तेमाल किया गया है. इस बस में 7 रेडियल ट्यूबलेस टायर दिए गए हैं. वहीं, इसकी टॉप स्पीड 70 किमी/घंटा है.टाटा मोटर्स की तरफ से पेश किए गए प्रोटोटाइप फ्यूल सेल बस की रेंज 300 किलोमीटर है, जो मध्यम और भारी वाहन बेड़े के मालिकों के लिए काफी है. यह वजनदार भार ले जा सकती है और लंबी दूरी के माल परिवहन को पूरा कर सकती है.टाटा मोटर्स एकमात्र भारतीय कंपनी है जिसे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन से 15 हाइड्रोजन फ्यूल सेल बसों के लिए अनुबंध हासिल हुआ है, जिसे अगले दो सालों के भीतर डिलीवर किया जाएगा.
इलेक्ट्रिक सेगमेंट पर है दबदबा
देश में अगर इलेक्ट्रिक वाहनों की बात करें तो टाटा मोटर्स का 90 फीसदी बाजार पर कब्जा है. कंपनी की ओर से नेक्सन, टिगोर जैसी इलेक्ट्रिक कारों को देश में काफी पसंद किया जाता है. इसके अलावा कंपनी ने कुछ समय पहले ही दस लाख रुपये से कम कीमत पर टियागो इलेक्ट्रिक को भी पेश किया है. जिसे पेश किए जाने के बाद से ही बड़ी संख्या में बुकिंग मिली है.
सीएनजी पर भी फोकस
इलेक्ट्रिक के अलावा कंपनी सीएनजी पोर्टफोलियो को भी बढ़ा रही है. इसकी शुरूआत भी कंपनी की ओर से जनवरी से की गई थी. जनवरी में कंपनी ने टिगोर और टियागो में सीएनजी को पेश किया था. जिसके बाद साल के आखिर में टियागो एनआरजी में भी सीएनजी की पेशकश की गई.
हाइड्रोजन प्रोपल्शन के अनोखे कॉन्सेप्ट
कंपनी ने कई अनोखे कान्सेप्ट वाहन पेश किए हैं जो हाइड्रोजन से चलेंगे. ये हैं :
स्टारबस : फ्यूल सेल ईवी-व्यावयासिक प्रयोग के लिए भारत की पहली हाइड्रोजन फ्यूल सेल बस
प्राइमा ई.55एस : भारत का पहला हाइड्रोजन फ्यूल सेल द्वारा पावर्ड ट्रैक्टर कॉन्सेप्ट.
प्राइमा एच.55एस: भारत का पहला हाइड्रोजन आईसीई से लैस कॉन्सेप्ट ट्रक.
टाटा पावर : कार्बन न्यूट्रल बनने का इरादा
जमशेदपुर में टाटा ग्रुुप की बड़ी कंपनियों में टाटा पावर भी शामिल है. जोजोबेड़ा में कंपनी का थर्मल पावर प्लांट है और वह टाटा स्टील को बिजली सप्लाई करती है और टाटा स्टील यूआईएसएल जो शहर के उद्योगों और नागरिक आबादी को बिजली देती है. अप्रैल, 1997 में जोजोबेड़ा में टाटा पावर ने टाटा स्टील के 67.5 मेगावाट के कैप्टिव पावर प्लांट का अधिग्रहण कर जमशेदपुर में शुुरूआत की और इस प्लांट में कुुल 427.5 मेगावाट पिजली का उत्पादन हो रहा है. उल्लेखनीय है कि टाटा पावर ने 1015 से बिजली का उत्पादन शुरू किया था, लेकिन इसका झारखंड में प्रवेश 1997 में हुआ. अब न केवल इसके कारोबार में विस्तार हो गया है, बल्कि उपस्थिति भी बढ़ गयी है.
टाटा पावर खुद पावर जेनरेट करता है, रिन्यूएबल एनर्जी से थर्मल पावर जैसे- हाइड्रो, सोलर, विंड और थर्मल पावर आदि स्रोतों से पावर बनाता है. पावर बनाने के साथ-साथ ही कंपनी खुद ही पावर को ट्रांसमिशन भी करती है और डिस्ट्रीब्यूटर भी खुद ही है.(जमशेदपुर मेें डिस्ट्रिब्यूशन और बिलिंग का काम टाटा स्टील यूआईएसएल के जिम्मे है).टाटा पावर हाइड्रो और विंड और सोलर से भी पावर जेनरेट करता है इसके साथ ही वेस्ट हीट रिकवरी स्रोतों से भी पावर जेनरेट करता है इन्हे क्लीन एनर्जी भी कहा जाता है.
वक्त के साथ बदलाव : टाटा पावर वक्त के साथ बदलता गया है. पिछले 90 सालों में कंपनी में उतने परिवर्तन नहीं हुए जितने पिछले कुछ सालों में हुए हैं.जैसे- एआई (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) मशीन लर्निंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल, रिन्यूएबल एनर्जी आदि.साथ ही 5जी टेक्नोलॉजी के अविष्कार से भी ये चीजें बहुत उन्नत हो गई हैं. टाटा पावर अपने बिजनेस मॉडल ट्रांसफॉरमेशन पर काम कर रही है. जो कि इसके ट्रेडिशनल बिजनेस मॉडल से बहुत अलग है. यह कंपनी इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग स्टेशन लगा रही है क्योंकि आने वाला समय इलेक्ट्रिक वाहनों का है. इलेक्ट्रिक इंफ्रास्ट्रक्चर में टाटा पावर सबसे बड़ा खिलाड़ी है.अगले तीन साल में कंपनी का 10,000 चार्जिंग स्टेशन सेटअप करने का टारगेट है.टाटा पावर का दूसरा नेक्स्ट जेनरेशन बिजनेस है रूफटॉप और सोलर पंप का, इसमें टाटा पावर मार्केट लीडर है. भारतीय मार्केट सोलर एनर्जी लिए तैयार था लेकिन लागत, इसमें सबसे बड़ा बैरियर था. अब सोलर एनर्जी दिन पर दिन सस्ती होती जा रही है.
होम ऑटोमेशन और स्मार्ट मीटर : टाटा पावर कंपनी का एक बिजनेस यूनिट माइक्रोग्रिड होम ऑटोमेशन और स्मार्ट मीटर का भी है. आजकल स्मार्ट मीटर का चलन बहुत ही तेजी से आगे बढ़ रहा है. क्योंकि इसमें आप रीयल टाइम में देख सकते हैं कि आपके इलेक्ट्रिक उपकरण कितनी बिजली कंज्यूम कर रहे हैं. इसमें आप मिनट, घंटे, दिन, साप्ताहिक और मासिक आधार पर देख सकते हैं कि आपका कौन सा इलेक्ट्रिक उपकरण कितनी बिजली कंज्यूम कर रहा है. आप टोटल कितनी पावर यूज कर रहे हैं, यह सारा डाटा टाटा पावर के स्मार्ट मीटर से पता लग जाता है. इस तरह लोग अपना इलेक्ट्रिसिटी यूज को अच्छे से मैनेज कर सकते हैं.टाटा पावर के स्मार्ट मीटर, मासिक बिजली बिल को भी ऑटोमेटिक रुप से अपडेट कर देते है. जिससे मेनुअल मीटर रीडिंग के बिना ही लोगों को आपने बिजली का बिल भी मिल जाता है. वन क्लिक पर पेमेंट भी जाता है. इसलिए यह भी टाटा पावर का नेक्स्ट जेनरेशन बिजनेस यूनिट है.
एआई का इस्तेमाल : टाटा पावर अपने पावर डिस्ट्रीब्यूशन में एआई का भी यूज कर रहा है. यहां पर वह एआई ऑटोमेशन की मदद से रीयल टाइम इलेक्ट्रिसिटी ऑपरेशन मैनेज करेगा. इस काम के लिए टाटा पावर ने वैल्यू वेव कंपनी के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है. यह कंपनी पावर सेक्टर में एआई आधारित एप्लीकेशन बनाने वाली सबसे पहली कंपनी है. टाटा पावर में सबसे बड़ा बदलाव जो हो रहा है वह रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में है. इसके द्वारा कंपनी जो कोयला, ऑयल तथा नेचुरल गैस से बिजली बनाती है, उसे वह अपने आने वाले समय में रिन्यूएबल एनर्जी से बनायेगी. कंपनी ने कहा है कि वह 2025 तक अपनी कुल पावर का 60 प्रतिशत क्लीन एनर्जी यानी रिन्यूएबल एनर्जी से बनाएगी.
कार्बन न्यूूट्रल बनने का इरादा : टाटा पावर 2050 तक कार्बन न्यूट्रल कंपनी बनना चाहती है, इसके लिए कंपनी बहुत सारे कदम भी उठा रही है. टाटा पावर का क्लीन एनर्जी की दिशा में सबसे बड़ा कदम यह है कि वह अपनी थर्मल पावर प्लांट में कोई भी नया निवेश नहीं करेगी. यानी कि जब यह प्लांट पुराने होकर बंद हो जाएंगे तो टाटा पावर कंपनी इनको दोबारा सही करके नहीं चलाएगी. टाटा पावर कोल इंडिया कंपनी से सबसे ज्यादा कोयला खरीदती है इसीलिए इसी वजह से कुछ सालों में कोयले का बिजनेस खत्म भी हो सकता है.
जब टाटा पावर थर्मल पावर बनाना कम करेगी तब इसकी ईएसजी रेटिंग बढ़ जाएगी. ईएसजी रेटिंग के ऊपर ही कंपनियों में बिलियन डॉलर निवेश किए जाते हैं. क्योंकि बड़े-बड़े निवेशक हाई ईएसजी रेटिंग वाली कंपनियों का पोर्टफोलियो बनाते हैं. जहां पर वह ऐसी कंपनियों में निवेश करते हैं, जो क्लीन एनर्जी का काम कर रही है, इलेक्ट्रिक व्हीकल में काम कर रही हैं या ऐसी कंपनियां जो भविष्य की टेक्नोलॉजी में काम कर रही हैं. बिना वातावरण को नुकसान पहुंचाए,इसका सीधा सा मतलब यह है कि यदि टाटा पावर कंपनी का ईएसजी बढ़ेेगा तो कंपनी में निवेश भी बढ़ेगा.

