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	<title>Tori Junction Archives - Udit Vani</title>
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	<description>पत्रकारिता में विश्वसनीयता के चार दशक</description>
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		<title>झारखंड: मां भगवती का दिव्य मंदिर, जहां 9 नहीं 16 दिनों की होती है नवरात्रि</title>
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		<pubDate>Sat, 23 May 2026 10:55:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>उदित वाणी, झारखंड: देश-दुनिया में आदिशक्ति के कई भव्य व चमत्कारी कथा से जुड़े मंदिर हैं, जहां कि कथा श्रद्धालुओं के विश्वास और भक्ति को और भी शक्ति देती है। देवी का ऐसा ही प्राचीन मंदिर झारखंड राज्य के लातेहार जिले में एक है, जहां आस्था की गहराई और आध्यात्मिक रहस्य एक साथ देखने को [...]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #800080;"><strong>उदित वाणी, झारखंड:</strong></span> देश-दुनिया में आदिशक्ति के कई भव्य व चमत्कारी कथा से जुड़े मंदिर हैं, जहां कि कथा श्रद्धालुओं के विश्वास और भक्ति को और भी शक्ति देती है। देवी का ऐसा ही प्राचीन मंदिर झारखंड राज्य के लातेहार जिले में एक है, जहां आस्था की गहराई और आध्यात्मिक रहस्य एक साथ देखने को मिलते हैं। लातेहार का यह दिव्य मंदिर एनएच-99 पर चंदवा और बालूमाथ के बीच स्थित है। चंदवा नगर से करीब 10 किलोमीटर दूर हरे-भरे पहाड़ों की तलहटी में बसा यह मंदिर प्रकृति और आध्यात्म का अद्भुत मेल है.</p>
<p>चारों तरफ फैली हरियाली, शांत वातावरण और ऊंची पहाड़ियां इस जगह को धार्मिक पर्यटन के लिए बेहद आकर्षक बनाती हैं। झारखंड सरकार के लातेहार जिला पोर्टल पर मंदिर के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। माता उग्रतारा मंदिर आदिशक्ति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। खास बात है कि यहां सामान्य नवरात्रि की 9 दिनों की परंपरा नहीं है, बल्कि पूरे 16 दिनों तक भक्तों की आस्था का सिलसिला चलता है। इस मंदिर की खासियत फूल गिरने और पान के आसन से गिरने की अनोखी मान्यताओं से भी जुड़ी है। लोक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। टोरी क्षेत्र के शासक पिताम्बर नाथ शाही एक बार शिकार के दौरान मांकरी गांव पहुंचे थे। प्यास लगने पर वह जोड़ा तालाब पर पानी पीने गए, जहां उन्हें दो प्रतिमाएं मिलीं- एक मां लक्ष्मी की और दूसरी मां उग्रतारा की.</p>
<p>कुछ दिन पहले उन्होंने इन्हीं प्रतिमाओं को सपने में देखा था। इस दिव्य संकेत को मानकर उन्होंने यहां मंदिर बनाने का फैसला किया। मंदिर से जुड़ी एक अन्य कथा रानी अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी है। कहा जाता है कि उन्होंने इस मंदिर का निर्माण करवाकर समाज के सभी वर्गों को पूजा का समान अधिकार दिया था। उन्होंने जाति-धर्म की दीवारों को तोड़ते हुए इस मंदिर को सबके लिए खोल दिया। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत 16 दिनों तक चलने वाली दुर्गा पूजा है। यहां जितिया त्योहार के दूसरे दिन से दुर्गा पूजा शुरू हो जाती है। पहले दिन कलश स्थापना के साथ अष्टभुजी माता की पूजा होती है। नवरात्रि के दौरान विशेष पूजन का विधान है। 16वें दिन विजयादशमी पर मां को पान चढ़ाया जाता है.</p>
<p>अनोखी मान्यता है कि जब पान आसन से गिर जाता है, तो इसे मां की ओर से विसर्जन की अनुमति माना जाता है। कई बार पान देर रात तक नहीं गिरता और आरती का सिलसिला पूरे रात चलता रहता है। इसी तरह यहां एक और मान्यता फूलों से जुड़ी है। भक्त मनोकामना पूरी होने के लिए फूल चढ़ाते हैं। अगर फूल जल्दी गिर जाते हैं तो समझा जाता है कि मां ने मनोकामना स्वीकार कर ली है। देवी का यह मंदिर न सिर्फ झारखंड बल्कि देश भर से आने वाले श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.</p>
<p>खास बात है कि यहां हिंदू, के साथ ही अन्य धर्मों के लोग भी आते हैं। पहाड़ी इलाके में स्थित होने के कारण यह जगह अध्यात्म के साथ ही पर्यटन के लिहाज से भी लोकप्रिय है। आसपास के प्राकृतिक नजारे, शांत वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा पर्यटकों को खासा आकर्षित करती है। मंदिर लातेहार जिला मुख्यालय से लगभग 37 किलो मीटर दूर है। रांची से लगभग 90 किलोमीटर दूर चंदवा-चतरा मुख्य मार्ग पर स्थित है। यहां पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे प्रमुख साधन है। मंदिर के नजदीक टोरी जंक्शन रेलवे स्टेशन लगभग 10 किलोमीटर दूर है। रांची से चंदवा होते हुए श्रद्धालु आसानी से मंदिर पहुंच सकते हैं.</p>
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