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	<title>GoldenEra Archives - Udit Vani</title>
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	<description>पत्रकारिता में विश्वसनीयता के चार दशक</description>
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	<title>GoldenEra Archives - Udit Vani</title>
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		<title>जमशेदपुर ने कॉरपोरेट रिर्पोटिंग को दी नेशनल पहचान</title>
		<link>https://uditvani.in/jharkhand/jamshedpur/jamshedpur-gives-national-identity-to-corporate-reporting/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Udit Vani]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Aug 2022 20:53:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जमशेदपुर]]></category>
		<category><![CDATA[GoldenEra]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>अजय कुमार सिंह उदित वाणी, जमशेदपुर : आम धारणा रही है कि कॉरपोरेट जगत मे अंग्रेजी का बोलबाला रहता है और इसी भाषा की मीडिया की खबरों पर इसके दिग्गज गौर करते हैं. लेकिन जमशेदपुर ने इस मिथक को तोडक़र हिंदी में अपनी कॉरपोरेट रिर्पोटिग से नेशनल पहचान बनाई है. देश के अग्रणी व प्रतिष्ठित औद्योगिक [...]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>अजय कुमार सिंह</strong><br />
<span style="color: #800080;"><strong>उदित वाणी, जमशेदपुर : </strong></span>आम धारणा रही है कि कॉरपोरेट जगत मे अंग्रेजी का बोलबाला रहता है और इसी भाषा की मीडिया की खबरों पर इसके दिग्गज गौर करते हैं. लेकिन जमशेदपुर ने इस मिथक को तोडक़र हिंदी में अपनी कॉरपोरेट रिर्पोटिग से नेशनल पहचान बनाई है. देश के अग्रणी व प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों में से एक टाटा के संस्थापकों द्वारा बसाए गए जमशेदपुर में अनेक कंपनियां हैं जहां कारपोरेट खबरों की भरमार होनी चाहिए. लेकिन शहर की स्थापना के करीब आठ दशक तक हिंदी मीडिया को कारपोरेट जगत से खास भाव नहीं मिलता था. अंग्रेजी के पत्रकारों के साथ दोस्ती की बदौलत ही हिंदी के पत्रकारों का इस बिट पर काम चलता था.</p>
<p>लेकिन शहर से पहले नियमित हिंदी दैनिक उदित वाणी के लांच होने के बाद 22 अगस्त 1980 से कॉरपोरेट रिपोटिंग में भी बदलाव आया. उदित वाणी ने अपनी स्थापना के पहले दशक में जमशेदपुर की कंपनियों से जुड़ी खबरों पर फोकस किया. 1990 के दशक से इसने अपना फलक बढ़ाना शुरू किया. संयोग से उसी कालखंड में वैश्विक कारपोरेट हस्ती रूसी मोदी का टाटा घराने के प्रमुख सदस्य रतन टाटा से मतभेद हो गया. दोनों के बीच इस मतभेद के बाद टाटा घराने खासकर जमशेदपुर के कंपनी जगत मे ऐसी हलचल होने लगी जिसे जानने, भांपने व पाठकों तक पहुंचाने में उदित वाणी आगे रहने लगा. रूसी मोदी व टाटा घराने से जुड़ी कई खबरों को ब्रेक कर उदित वाणी ने जमशेदपुर की कॉरपोरेट रिर्पोटिंग को नेशनल पहचान दी. इसी तरह से उन दिनों यूनियन की खबरें भी एक नजर यानी संक्षिप्त खबरों की श्रेणी की हुआ करती थीं. देश में निजी क्षेत्र की सबसे धनी व बड़ी यूनियन टाटा वकर्स यूनियन से जुड़ी खबरों का लगातार प्रकाशन शुरू कर उदित वाणी से न सिर्फ नजीर पेश की बल्कि अन्य मीडिया संस्थाओं को भी इसे कवर करने के लिए एक तरह से बाध्य कर दिया. कई बार तो खुद को बड़े अंग्रेजीदां समझनेवाले कमर्शियल रिपोर्टर भी उदित वाणी के रिपोर्टरों से मदद लेते पाए गए क्योंकि उनके पास सही स्रोत तक पहुंचने का माद्दा नहीं था. लोकल रिपोर्टिंग का लाभ न केवल पाठकों को बल्कि बाहर के प्रकाशनों को भी हुआ.</p>
<p>इसी तरह जब ब्रिटेन की कंपनी कोरस के अधिग्रहण की बात चली और इसमें टाटा समूह ने दिलचस्पी लेनी शुरू की तो उदित वाणी ने कई ऐसी खबरें ब्रेक की जो बाद में नेशनल मीडिया की सुर्खियां बनीं. इसी तरह राडिया दलाली प्रकरण में उदित वाणी अंदरखाने की जानकारी सामने लेकर आया. शहर में नगर निगम की स्थापना को लेकर चले आंदोलन में पाठकों को सही तथ्य उदित वाणी ने उपलब्ध कराए और इस मामले में किसी तरह की पक्षधरता नहीं की. इसी तरह टाटा स्टील कारखाने में में 3 मार्च, 1989 को हुई फायर ट्रेजेडी को लेकर लोगों को पैनिक किए बगैर उदित वाणी ने तटस्थ रिपोर्टिंग कर मिसाल पेश की थी. शहर में खेल से जुड़े बड़े आयोजन कारपोरेट खासकर टाटा स्टील की ओर से ही होते रहे हैं. इंटरनेशनल क्रिकेट मैच, घरेलू मैच, सुपर सॉकर, आर्चरी, एथलेटिक्स, डेफ एंड डम्ब स्पोट्र्स, घुड़सवारी प्रतियोगिता, बॉस्केटबॉल आदि के बड़े मुकाबले टाटा स्टील की ओर से आयोजित होते रहे हैं और रोचक यह है कि ऐसे आयोजनों में स्पोट्र्स रिपोर्टर के साथ कॉरपोरेट रिपोर्टर की जुगलबंदी पत्रकारिता में नए तरह का आयाम पेश करती है क्योंकि खेलों का एक हिस्सा कारपोरेट वल्र्ड से भी जुड़ा होता है. बेशक, जमशेदपुर ने कॉरपोरेट रिपोर्टिंग की धार दी, उसने नेशनल फलक प्रदान किया लेकिन हाल के दिनों में पाठकों को उदित वाणी समेत अन्य जगहों से भी कॉरपोरेट से जुड़ी वैसी रोचक व सूचनात्मक खबरें नहीं मिल रही हैं जिनके फ्लेवर का कायल जमशेदपुर हो गया है. अब न तो कारपोरेट दिग्गजों के शीतयुद्ध के बारे में कुछ पता चल रहा और न ही यूनियन नेताओं के स्वार्थ की पूर्ति जानकारी सामने आ रही.</p>
<p>किस यूनियन नेता ने किस कोटे से कितनों को उपकृत कराया या क्या-क्या फायदा बटोरा इससे भी पाठक अनजान रहते हैं. यूनियन की अंदरुनी मीटिंग या उच्च प्रबंधन के साथ वार्ता की श्रमिकों से जुड़ीं ऑफ दी रिकार्ड बातें भी कोई नहीं जान बाता. लग रहा कि सबकुछ सेटिंग-गेटिंग से सहारे चल रहा. बीच-बीच में उदित वाणी इस धारणा को तोडऩे का प्रयास करता है. आदित्यपुर इलाके में उद्यमियों का आर्थिक दोहन करने में जुटे एक नेताजी और उनके आका की पोल खोल इस अखबार ने दिखाया कि उसके तेवर में कोई कमी नहीं आई है. टाटा वर्कर्स यूनियन के पिछले चुनाव से समय भी इस अखबार की धार देखने को मिली थी. लेकिन इसी से काम नहीं चलनेवाला. इसमें निरंतरता होनी चाहिए. उदित वाणी से आस है.</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>Jamshedpur : मोबाइल पर ‘उदित वाणी’, विश्वसनीयता का रिंगटोन</title>
		<link>https://uditvani.in/jharkhand/jamshedpur/reliability-ringtone-on-mobile-phone/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Udit Vani]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Aug 2022 20:46:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जमशेदपुर]]></category>
		<category><![CDATA[GoldenEra]]></category>
		<category><![CDATA[jamshedpur]]></category>
		<category><![CDATA[uditvani]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>डॉ. कुंदन कुमार उदित वाणी, जमशेदपुर : इसे सुखद संयोग ही कहेंगे कि 22 अगस्त 2009 को जमशेदपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार उदित वाणी की 19वीं वर्षगांठ पर टी रमेश का एक आलेख छपा था- आएगा वो दिन, मोबाइल पर पढ़ेंगे अपना उदित वाणी. तब लोकल या आंचलिक अखबारों के ऑनलाइन संस्करण के [...]</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डॉ. कुंदन कुमार</strong><br />
<span style="color: #800080;"><strong>उदित वाणी, जमशेदपुर : </strong></span>इसे सुखद संयोग ही कहेंगे कि 22 अगस्त 2009 को जमशेदपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार उदित वाणी की 19वीं वर्षगांठ पर टी रमेश का एक आलेख छपा था- आएगा वो दिन, मोबाइल पर पढ़ेंगे अपना उदित वाणी. तब लोकल या आंचलिक अखबारों के ऑनलाइन संस्करण के बारे में सोचा नहीं जाता था. लेकिन टी रमेश ने उदित वाणी को लेकर जो उम्मीद जताई थी वो अब कोरोना के बाद के मीडिया के युग में एक हकीकत के रूप में मूर्तरूप ले चुकी है. चलिए देर आए दुरुस्त आए. लेकिन इतने भर से काम नहीं चलने वाला, नए दौर की पत्रकारिता में उदित वाणी के ऑनलाइन माध्यम उदित वाणी डॉट इन के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वह अपने प्रिंट संस्करण की तरह ही खबरों और सूचनाओं की साख और विश्वसनीयता को कामय रखे. अपना ओरिजनल फ्लेवर पाठकों को मुहैया कराता रहे. उदित वाणी को लोग पत्रकारिता में विश्वसनीयता के पर्याय के रूप में जानते व पहचानते हैं.</p>
<p>22 अगस्त 1980 को अपनी यात्रा के शुरूआत के साथ उतिदवाणी ने तय कर लिया था कि वह पाठकों के बीच अपनी ऐसी पहचान बनाएगा जिसे लोग शिद्दत से याद करेंगे और दूसरों के सामने उदाहरण के रूप में भी प्रस्तुत करेंगे. एक पाठक के रूप में हमें भी इस गर्व की अनुभूति होती है कि 42 साल के अपने सफरनामे में उदित वाणी ने अपने चरित्र और व्यवहार दोनों ही स्तरों पर अपनी साख और विश्वसनीयता को कायम रखा है. आधुनिक तकनीक की कसौटी पर उदित वाणी से और अपेक्षाएं स्वाभाविक हैं लेकिन गर्व करने लायक बात यह है कि उदित वाणी अपने बलबूते बना है, टिका है और आगे बढ़ रहा है. किसी व्यावसायिक घराने की छत्रछाया से दूर रहना ही इसकी पूंजी है.</p>
<p>गौर करने लायक बात यह भी कि चरित्र और व्यवहार के मानक पर यह बड़े से बड़े अखबार से जरा सा भी कमतर नहीं है. चरित्र से उदित वाणी सबल है. अखबार का मूल चरित्र क्या है, इसको जानने के लिए देखना होता है कि अखबार किसकी बात करता है. किसकी आवाज उठाता है? उदित वाणी हमेशा से सिर्फ और सिर्फ अपने पाठकों के हक की बात करता है. उनकी आवाज उठाता है न तो किसी राजनीतिक विचारधारा का वाहक बनता है और न ही किसी दल विशेष का. किसी व्यवसायिक या कारोबारी घराने से भी इसका कोई लेना देना नहीं रहा है. सिर्फ पाठकों के समर्थन और प्यार के बूते अपने मूल चरित्र को अक्षुण बनाए रखकर यह अपने पेशेवर व्यवहार को अमलीजामा पहनाता रहा है. ऑनलाइन मीडिया के क्षेत्र में उदित वाणी से अपने इसी चरित्र और व्यवहार को बचाए और बनाए रखने की आस पाठकों को रहेगी. ऐसा इसलिए क्योंकि ऑनलाइन मीडिया में सूचनाओं को प्रचारित-प्रसारित करने की इतनी गलाकाट प्रतिद्वंद्विता है कि अक्सर खबरें क्रॉस चेकिंग के बगैर ही पाठकों तक पहुंचा दी जाती है. जबकि पत्रकारिता का मूल सिद्घांत यही है कि जब तक खबर की तथ्यों की सत्यता न जान ली जाए तब तक पाठकों तक उसे नहीं पहुंचाना चाहिए. लेकिन आज के दौर के ऑनलाइन मीडिया में इसे देखने जानने या समझने की फुर्सत किसे है. किसी को फुर्सत नहीं है इसीलिए तो ऑनलाइन मीडिया की साख का बंटाधार हो रहा है. उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्नï खड़े हो रहे हैं. फेक न्यूज का चलन बढ़ रहा है और पेड न्यूज का धब्बा भी उसपर लग रहा.</p>
<p>इसलिए उदित वाणी डॉट इन से अपेक्षा यही है कि वह खबरों की संख्या गिनने के फेर में बिलकुल न पड़े, फोटो का आकार-प्रकार जांचने की होड़ में बिलकुल ही शामिल न हों. वह सिर्फ और सिर्फ वैसी ही खबरों को स्थान दे जो सीधे तौर पर आम पाठकों के हितों से जुड़ी हुई हों, जनता के सरोकार को प्रभावित करती हों. जिनमें सूचना का पुट हो और जो पाठकों को जागरूक करने में भी प्रभावी साबित हों.<br />
आज के दौर में मीडिया को पाठकों के बदलते मन-मिजाज पर भी ध्यान रखना होगा. समय के साथ जो बदलता है और अपने नये पाठकों को जोड़ते हुए उनके मन मिजाज पढ़ समझकर उनके फ्लेवर का कंटेंट प्रस्तुत करता है वही मीडिया लंबी पारी खेलता है. उदित वाणी को भी अपने न्यूज पोर्टल में इन बातों को आत्मसात करना होगा.<br />
बदलते जमाने के साथ उदित वाणी ने अपना बहुत कुछ बदला है. बदलाव की प्रक्रिया जारी है. एक और बड़ा बदलाव दस्तक दे रहा है. अब उदित वाणी को अपना ई पेपर भी सहजता और सरलता पूर्वक उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि लोग उसे आसानी से डाउनलोड कर किसी दूसरे को भी भेज सकें या अपने भी पढ़ सकें. उदित वाणी के व्हाट्सएप एडिसन की अपनी सीमाएं हैं, अपनी कमियां हैं उन्हें भी दूर करने पर ध्यान देना होगा.<br />
एक बात और भगवान ने चाहा तो उदित वाणी को अभी और मिलेगा व्यापक फलक. सूचना तकनीक के इस दौर में सभी माध्यमों पर उपलब्ध होगा आपका उदित वाणी.</p>
<p>और तब हमारे जैसे पाठक सहसा कह उठेंगे कि क्या वाकई इतना बदल गया उदित वाणी. ठीक उसी तरह जैसे आज हमलोग अपने बच्चों से कहते हैं कि 42 साल में बहुत बदल गया उदित वाणी.<br />
सकारात्मक सोच के साथ, मजबूत नींव पर उदित वाणी की पत्रकारिता उत्तरोत्तर ऊंचाई की ओर बढ़ती रहे यही हमारे जैसे असंख्य पाठकों की कामना और उम्मीद है.</p>
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		<title>Jamshedpur : अपने सुनहरे दौर को लौटने की आस में जमशेदपुरिया मीडिया</title>
		<link>https://uditvani.in/jharkhand/jamshedpur/jamshedpuria-media-in-the-hope-of-returning-to-its-golden-era/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Udit Vani]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 21 Aug 2022 20:36:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जमशेदपुर]]></category>
		<category><![CDATA[GoldenEra]]></category>
		<category><![CDATA[jamshedpur]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>टी रमेश उदित वाणी, जमशेदपुर : मैं जमशेदपुरिया पत्रकारिता हूं. नियमित रूप से व पूरी निरंतरता के साथ पाठकों के साथ मेरा जुड़ाव 22 अगस्त 1980 को हुआ था. कह सकते हैं कि मेरी काल गणना के आरंभ की तिथि यही है. इस ऐतिहासिक दिन को सिंहभूम (कोल्हान) की धरती और वैश्विक पटल पर स्टील सिटी [...]</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>टी रमेश</strong><br />
<span style="color: #800080;"><strong>उदित वाणी, जमशेदपुर : </strong></span>मैं जमशेदपुरिया पत्रकारिता हूं. नियमित रूप से व पूरी निरंतरता के साथ पाठकों के साथ मेरा जुड़ाव 22 अगस्त 1980 को हुआ था. कह सकते हैं कि मेरी काल गणना के आरंभ की तिथि यही है.</p>
<p>इस ऐतिहासिक दिन को सिंहभूम (कोल्हान) की धरती और वैश्विक पटल पर स्टील सिटी की पहचान रखने वाले जमशेदपुर के जुगसलाई से तत्कालीन अखंड बिहार के मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के हाथों हिन्दी दैनिक उदित वाणी का लोकार्पण हुआ. इसके साथ ही जमशेदपुर में शुरू हुआ पहले नियमित हिन्दी दैनिक का प्रकाशन. जो आज एक व्यापक बाजार और असीम संभावनाओं का वृहद आकार ग्रहण कर चुका है. इस तरह से देखा जाए तो जमशेदपुर में नियमित पत्रकारिता अपने स्वर्ण जयंती की ओर कदम बढ़ा चुकी है.</p>
<p>मैं तब बहुत ही आनंदित और उत्साह से लवरेज हो उठता हूं जब कोल्हान की धरती पर कोई अखबार या मीडिया संस्थान अपनी वर्षगांठ मना रहा होता है. इसीलिए 22 अगस्त की तिथि आते ही मेरे भीतर का जज्बा और उत्साहि हो जाता है और कुछ कर गुजरने की उम्मीदें हिलोरें मारने लगती हैं. मेरा दायरा बहुत बड़ा है. मेरे स्कूल से निकले पत्रकारिता के विद्यार्थी देश-विदेश में अपनी कामयाबी का झंडा गाड़े हुए हैं. प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रोनिक चैनल तक और वेब पोर्टल से लेकर यूट्यूब चैनल और सोशल मीडिया तक. हर जगह आप जमशेदपुरिया स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के संस्कारों में पले-बढ़े पत्रकारों को देख सुन पढ़ सकते हैं.<br />
इस कसौटी पर देखा जाए तो मेरे लिए चारों तरफ सावन ही सावन है. मेरा रूप भी बदला है, स्वरूप भी बदला है, संभावनाएं भी बदली हैं और बहुत कुछ बदलने की आस भी बनी हुई है. एक नजरिए से देखा जाए तो किसी के जीवन में स्वर्णजयंती का बहुत ही अहम महत्व होता है. जिसे जीवन में किसी भी रूप में स्वर्ण जयंती मनाने का अवसर मिलता है उसकी तो बल्ले-बल्ले रहती है. तो भला मैं क्यों न अभी से अपने गोल्डन जुबिली को लेकर खुशी से न इतराऊं?<br />
लेकिन एक कसक भी है. मुझे अपने सुनहरे दिनों की बहुत याद आती है. अभी मेरे पास सबकुछ है. नाम भी, पहचान भी, विस्तार का क्षेत्र भी, आय का स्रोत भी. रोजगान देने की संभावना भी और समय के साथ कदमताल करते हुए चलने की क्षमता भी. कभी दुनिया मुझे लोकल अखबार वाले शहर का मीडिया कहती थी. लेकिन मैं इसे अपना तौहीन नहीं मानता था. मेरा हौसला जेएन टाटा जी जैसा फौलादी था. मुझे विश्वास था कि कामयाबी एक दिन अवश्य मिलेगी. यदि सरकार में क्लास 1 की नौकरी छोड?र राधेश्याम अग्रवाल ने जमशेदपुर की धरती पर मेरा अवतरण नहीं कराया होता तो मैं इस रूप में आपसे कैसे रूबरू होता. इसलिए राधेश्याम जी अग्रवाल को बहुत-बहुत बधाई व शुभकामनाएं.</p>
<p>अरे मैं अब मूल विषय पर लौटता हूं. हमारी शुरूआत के साथ जमशेदपुर में अखबार पढऩा सीखा. विज्ञापन देना जाना. और पे्रस विज्ञप्ति से लेकर विभिन्न आयोजनों को समाचार के रूप में प्रकाशन का अवसर पहचाना. इस तरह 1980 के दशक में मेरी विकास यात्रा रही. 1990 का दशक तो मेरे डंका बजाने का दौर था. उदित वाणी ने मेरे लिए इतना मजबूत आधार बना दिया कि दूसरे शहरों से बड़े-बड़े अखबार जमशेदपुर की ओर चमकती नजरों और लपलपाती जीभों से देखने लगे. वे अपने को यहां आने से रोक नहीं सके. राष्टï्रीय हिन्दी दैनिक आज से इसकी शुरूआत हुई. वह वाराणसी से चलकर आया. आवाज धनबाद से आया. कई नए अखबार जमशेदपुर से ही शुरू हुए. बाद में हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर का भी प्रकाशन स्थल मेरा जमशेदपुर बना.</p>
<p>1990 के दशक में उदित वाणी के जरिए मेरा सुनहरा काल वैश्विक पटल पर दिखा. राजनीतिक रिपोर्टिंग से लेकर ट्रेड यूनियन की खबरों तक को पाठकों के सरोकार के नजरिए से हमने परोसा. कारपोरेट रिपोर्टिंग के कखग से पाठकों को अवगत कराया. क्राइम की खबरों को घटनास्थल पर जाकर प्रस्तुत करने की परिपाटी का श्रीगणेश किया. कार्यक्रम के लाइव कवरेज को चलन में लाया. खबरों के आगे-पीछे देखने समझने की कला भी विकसित की जिसे आज के दौर में फॉलोअप के रूप में जाना जाता है. इस दौर में जमशेदपुरिया पत्रकारिता ने और भी बहुत कुछ किया. निडरता और निर्भिकता के मापदंड पर खुद को चौबीस कैरेट की तरह साबित किया. सत्ता से जुड़ी सूचनाओं और खबरों का सही आंकलन कर पाठकों के बीच जस का तस प्रस्तुत किया. यह दौर था जब जमशेदपुर भी बिहार का अंग हुआ करता था और ललू यादव जैसा प्रतापी राजा बिहार का मुख्यमंत्री हुआ करता था. लेकिन चारा घोटाला के भंडाफोड़ से लेकर सत्ता से लालू की विदाई तक के घटनाक्रम को जमशेदपुर मीडिया ने जिस कलेवर और अंदाज में प्रसतुत किया वह पत्रकारिता के स्वर्णिम इतिहास की एक सुनहरे पन्नों में शोभा बढ़ाता है. इसी तरह जब केंद्र में खिचड़ी सरकार की प्रयोगशाला काम कर रही थी. जब देवगौड़ा, गुजराल जैसे प्रधानमंत्री आ-जा रहे थे तब भी हमने उसी बेबाकी से घटनाक्रम को देखा समझा और परखा. झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में हमने भी हरसंभव योगदान दिया. इसीलिए जब वर्ष 2000 में झारखंड गठन की स्थिति बनी तो हमने पूरे घटनाक्रम को आशावादी नजरों के साथ प्रस्तुत कर बढ़त हासिल की.</p>
<p>कारपोरेट रिपोर्टिंग में सच के साथ कलम चलाकर हमने नेशनल मीडिया तक में सनसनी पैदा कर दी थी. उन दिनों विश्वस्तर के कारपोरेट लीडर और टाटा स्टील के सीएमडी रूसी मोदी का अपने टाटा घराने के साथ अनबन चल रही थी बाद में उन्होंने बदले की भावना से प्रेरित होकर टाटा घराने को सबक सिखाने के लिहाज से ट्रेड यूनियन से लेकर सियासत तक में अपनी दखल दी. लेकिन हमें गर्व है कि रूसी मोदी को हमने साफ शब्दों में बता दिया था कि ट्रेड यूनियन या सियासत आपके बस की बात नहीं. आपको कारपोरेट में ही केंद्रित रहना होगा. अंतत: हुआ भी ऐसा ही. इस कालखंड में हमने जनसरोकार के साथ भी जमकर जिया. जनता से जुड़. हर मुद्दे को उभरा. बात चाहे मानगो नये पुल के निर्माण की रही हो. स्टेशन रोड के मरम्ती कर रही हो. टाटा लीज क्षेत्र के विकास में गंगा बहाने की हो या मालिकाना हक के मुददे की. हमने इन मुद्दों को प्रमुखता से उभरा और बहुत हद तक अंजाम तक भी पहुंचाया. उरांव बस्ती शराब कांड को हमने राष्टï्रीय स्तर तक मुद्दा बनाया तो गणेशजी के दूध पीने की घटना के समय हमने अंधविश्वास पर भी प्रहार किया और साफ-साफ बताया कि गणेशजी के दूध पीने की घटना कोई दैवीय चमत्कार नहीं बल्कि विज्ञान के सर्फेसटेंशन का कमाल है.<br />
क्या भूलूं क्या याद करूं. आज के दौर में अपनी पहचान से ही मुझे दूरी होने लगी है. एक समय था जब सूचना के अंदर की जानकारी के लिए लोग मुझे खोजा और पढ़ा करते थे आज मेरे दायरे को प्रेस विज्ञप्ति तक सिमटा दिया गया है.</p>
<p>राजनीतिक रिपोर्टिंग नेताओं की बयानबाजी तक सिमट गई है. कारपोरेट रिपोर्टिंग भी प्रेस विज्ञप्ति भर स्थान पा रही. ट्रेड यूनियन की चर्चा उसके चुनाव में या रक्तदान या भजन संध्या के आयोजनों तक सिमट गई है. जनसरोकार के मुद्दे भी अब नेताओं के श्रीमुख से निकल रहे हैं. घटनात्मक खबरों की रिपोर्टिंग भी रूटिंग टाइप में हो रही है. प्रशासन से जारी होने वाली प्रेस विज्ञप्ति अब डीसी बीट के काम को हल्का कर चुकी है और धर्म-अध्यात्म के कार्यक्रम भी इवेंट मैनेजरों की इच्छा और संसाधनों तक सिमट कर रह रहे हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य और सरोकार के अन्य विषय भी रूटिंग अंदाज में आ-जा रहे हैं. इसीलिए तो नई पीढ़ी के लिए मैं स्टीरियो टाइप की पहचान वाला बनता जा रहा. यह स्थिति मेरे लिए अकल्पनीय दुखद है. इसीलिए तो मैं कामना करता हूं, दुआ करता हूं, उम्मीद करता हूं, विश्वास करता हूं, आस करता हूं और प्रार्थना करता हूं कि कोई मेरा सुनहरा कालखंड लौटा दे और मैं फिर उसी समय में अपने को आत्मसात कर अपनी पत्रकारिता के फ्लेवर में मंत्रमुग्ध होकर रहूं. काश, कोई आकर बताता कि अबे, आज तेरी हेडिंग-(लालू चले, लालू 24 घंटे, गये गुजराल, नजरों के सामने झारखंड, दरवाजे पर झारखंड, झारखंड, गांव से चलकर शहर आएंगे रूसी मोदी, मधेपुरा में राजा का बज गया बाजा, दूध पिया तो ये हाल, बोल देंगे तो क्या होगा, थैंक्यू आजादी, आइ डिड माई थैंक्यू जमशेदपुर&#8230; जैसी) पाठकों पर कहर ढाह रही है. तू ब्लैक में बिक रहा है. क्या कमाल का फ्लेवर है तेरा. इसीलिए तो देश के बाकी जगहों का मीडिया तूझपर ईष्र्या भी करता और तूझ पर मरता भी है. आखिर में एक उम्मीद कि अपने स्वर्ण जयंती वर्ष की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा उदित वाणी. मेरे सुनहरे दिन को लौटाने की दिशा में सकारात्मक आवाज करेगा. बाकी संस्थान धीरे-धीरे इसका वाहक बनेंगे.</p>
<p>The post <a href="https://uditvani.in/jharkhand/jamshedpur/jamshedpuria-media-in-the-hope-of-returning-to-its-golden-era/">Jamshedpur : अपने सुनहरे दौर को लौटने की आस में जमशेदपुरिया मीडिया</a> appeared first on <a href="https://uditvani.in">Udit Vani</a>.</p>
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